इलेक्ट्रिक वाहन नीति के अनुसार बढ़ानी होगी बैट्री निर्माण क्षमता, नहीं तो चीन को मिल सकता है बड़ा बाजार
वित्त मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2030 तक भारत में सालाना एक करोड़ इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री होगी। लेकिन अगर सरकार इन वाहनों में इस्तेमाल होने वाले बैट्रियों के निर्माण का पूरा तंत्र घरेलू स्तर पर विकसित नहीं कर पाती है तो यह पड़ोसी देश चीन को एक बहुत ही बड़ा बाजार मिल सकता है। भारत में कुल 12.43 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री हुई है।
पिछले वित्त वर्ष 2022-23 में भारत में कुल 12.43 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री हुई है जो वर्ष 2021-22 के मुकाबले ढाई गुणा ज्यादा था।
वित्त मंत्रालय के मुताबिक, वर्ष 2030 तक भारत में सालाना एक करोड़ इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री होगी। लेकिन अगर सरकार इन वाहनों में इस्तेमाल होने वाले बैट्रियों के निर्माण का पूरा तंत्र घरेलू स्तर पर विकसित नहीं कर पाती है तो यह पड़ोसी देश चीन को एक बहुत ही बड़ा बाजार मिल सकता है। भारत के लिए समस्या यह है कि उसके पास फिलहाल इन बैट्रियों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का उत्पादन नहीं हो रहा है। जरूरी खनिजों के खदान भी नहीं है।
केंद्र सरकार ने की पीएलआई स्कीम की घोषणा
केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 में वाहनों में इस्तेमाल होने वाले बैट्रियों का निर्माण घरेलू स्तर पर करने के लिए पीएलआइ स्कीम की घोषणा की है, लेकिन उसका बहुत प्रभावकारी असर आने में कुछ वर्ष लग सकते हैं। यह बात उद्योग चैंबर सीआइआइ की तरफ से गठित एक कार्य दल ने अपनी रिपोर्ट में उठाई है और सरकार को कई सुझाव दिए हैं।सीआइआइ से पहले सीईईडब्लू और जीटीआरआइ जैसी कुछ दूसरी घरेलू एजेंसियां भी पिछले कुछ महीनों में इस तरह की बात कर चुकी हैं। सीआइआइ चूंकि देश का सबसे बड़ा उद्योग चैंबर है और उसकी रिपोर्ट कई लिहाज से ज्यादा व्यापक है।
2030 तक 220 जीडब्लूएच हो जाएगी वाहन बैट्री की मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 में भारत में वाहन बैट्री की मांग 20 गीगावाट हावर (जीडब्लूएच- बैट्रियों से उत्पादित बिजली) से बढ़ कर वर्ष 2030 तक 220 जीडब्लूएच हो जाएगी। घरेलू बाजार की इलेक्टि्रक वाहनों की मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर बैट्री निर्माण की भी जरूरत होगी। इनके लिए लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज और ग्रेफाइट, निकेल व कॉपर जैसे खनिजों की जरूरत होगी। इसमें सबसे जरूरी लिथियम व कोबाल्ट हैं।
45 फीसद होती है बैट्री की लागत
इलेक्ट्रिक वाहन की कुल कीमत का 45 फीसद उसकी बैट्री की लागत होती है। घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने से इसकी कीमत भी कम हो सकती है। वित्त मंत्रालय की तरफ से तैयार आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 में कहा गया था कि वर्ष 2030 तक भारत में हर साल एक करोड़ इलेक्ट्रिक वाहन बेचे जाएंगे। आर्थिक कारोबार पर शोध करने वाली एजेंसी जीटीआरआइ की फरवरी, 2023 में जारी रिपोर्ट बताती है कि भारतीय वाहनों के लिए जरूरी बैट्री का 74 फीसद चीन से आता है।
सीआईआई ने क्या कहा?
ये राज्य दे रहे बैट्री निर्माण को बढ़ावा
शुभ संकेत यह है कि कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, तमिनलाडु और गुजरात जैसे कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर बैट्री निर्माण को बढ़ावा देने की नीति घोषित की है। केंद्र की पीएलआइ स्कीम के तहत भी रिलायंस, राजेश एक्सपोर्ट, ओला जैसी कंपनियों का चयन किया गया है। जापान की तोशिबा और दक्षिण कोरिया की सैमसंग भारत में लिथियम आयन बैट्री के निर्माण में उतरने का ऐलान किया है। अमारा राजा और टाटा केमिकल्स जैसी निजी घरेलू कंपनियां भी इस क्षेत्र में नया निवेश कर रही हैं।


