सरकारी फरमान हवा हवाई, डॉक्टर नही लिख रहे है जेनेरिक दवाई, जेनेरिक और ब्रॉडेड दवाओं की गुणवत्ता और असर में नही होता कोई अंतर
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की खुलेआम उड़ रही हैं धज्जियाँ, मनमानी कर रहें है चिकित्सक,चिन्हित पैथोलॉजी से जांच और कमीशनखोर मेडिकल स्टोर्स से दवा नही लेने पर मरीजों के साथ होता है दुर्व्यवहार संजल प्रसाद (वरिष्ठ पत्रकार) की खास रिपोर्ट
संजल प्रसाद(वरिष्ठ पत्रकार)
वाराणसी। बीते दिनों बड़े ही जोर-शोर से सरकारी फरमान जारी किया गया था कि अब सभी सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स जेनेरिक दवाइयां नही लिखेंगे तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह भी कहा गया था कि जेनेरिक दवा लिखने से परहेज करने वाले डॉक्टरों को अब लेने के देने पड़ने वाले हैं। वजह, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने देश के डॉक्टर्स के लिए नए नियम जारी किए हैं। नए नियमों के मुताबिक अब देश के सभी डॉक्टर्स के लिए जेनेरिक दवाइयां प्रेस्क्रिप्शन में लिखना अनिवार्य होगा। अगर कोई भी डॉक्टर ऐसा नहीं करता है, तो उसके प्रैक्टिस लाइसेंस को भी अस्थायी तौर पर सस्पेंड किया जा सकता है। लाइसेंस सस्पेंड करने के अलावा कई अन्य दंड का भी प्रावधान किया गया है। नेशनल मेडिकल कमीशन के नए नियमों के अनुसार अब सभी डॉक्टर्स को जेनेरिक दवाएं लिखनी ही होगी। अगर कोई डॉक्टर ऐसा नहीं करता है, तो उसे दंडित भी किया जा सकेगा। एनएमसी ने डॉक्टर्स से यह भी कहा है कि वह ब्रॉडेड दवाओं को लिखने से भी बचें। बीते 2 अगस्त को ही एनएमसी ने नियमों का नोटिफिकेशन जारी करते हुए कहा कि भारत में जेनेरिक दवाएं ब्रॉडेड दवाओं की तुलना में 30 से 80 प्रतिशत तक सस्ती हैं। भारत में दवाइयों पर आम आदमी की जेब पर बड़ा भार पड़ता है। ऐसे में जेनेरिक दवाएं प्रेस्क्राइब करने पर हेल्थ पर होने वाले खर्च में काफी कमी आएगी। दरअसल, जेनेरिक और ब्रॉडेड दवाओं की गुणवत्ता और असर में कोई अंतर नहीं होती, लेकिन तमाम बड़ी कंपनियां ऊंची कीमत वाली दवाइयों को प्रेस्क्राइब करने के लिए काफी ऑफर चलाती रहती हैं। एनएमसी नियमों के अनुसार, डॉक्टर्स को जेनेरिक दवाएं ही लिखनी होगी। बार-बार आदेश का उल्लंघन करने पर डॉक्टर का प्रैक्टिस करने का लाइसेंस एक विशेष अवधि के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। साथ ही डॉक्टर्स को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह अगर किसी मरीज का पर्ची बना रहा यानी की प्रेस्क्रिप्शन लिख रहा है, तो वह उसे स्पष्ट भाषा में लिखे जो किसी से भी पढ़ा जा सके। नेशनल मेडिकल कमीशन ने आदेश दिया है कि दवाइयों के नाम अंग्रेजी के कैपिटल लेटर्स में लिखा जाना चाहिए। अगर हैंडराइटिंग सही नहीं है, तो पर्ची को टाइप कराकर मरीज को प्रेस्क्रिप्शन दिया जाए। एनएमसी ने एक टेम्पलेट भी जारी किया है। इस टेम्पलेट का उपयोग नुस्खा लिखने के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। नेशनल मेडिकल कमीशन यानी राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने आदेश में कहा कि अस्पतालों और डॉक्टर्स को मरीजों को जन औषधि केंद्रों और अन्य जेनेरिक फार्मेसी दुकानों से दवाएं खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
मेडिकल छात्रों और जनता को उनके ब्रांडेड समकक्षों के साथ जेनेरिक दवा की समानता के बारे में शिक्षित करना चाहिए। जेनेरिक दवाओं के प्रचार को बढ़ावा देनी चाहिए। खास बात तो यह है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के कड़े आदेश के बावजूद उसके आदेशों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, उसका पालन नही किया जा रहा है। सरसुन्दर लाल चिकित्सालय, शिवप्रसाद गुप्त अस्पताल, पंडित दीनदयाल राजकीय अस्पताल, राजकीय उच्चस्तरीय अस्पताल, मानसिक चिकित्सालय जैसे तमाम सरकारी अस्पताल के चिकित्सक खुलेआम बाहर से महंगी से मंहगी जांच-दवाई अपने चिन्हित, चिर-परिचित मेडिकल स्टोर्स, पैथोलॉजी पर जांच, दवाइयां लिख रहे है और अवैध तरीके से मोटी रकम की कमाई में लगे हुए है।
नियमतः सरकारी अस्पताल में दवा प्रतिनिधियों का प्रवेश प्रतिबन्धित है। बावजूद इसके कोई भी ऐसा सरकारी अस्पताल नही बचा है जहां चिकित्सकों के चेम्बर से लेकर अस्पताल के अंदर- बाहर मेडिकल रिप्रेजेंटेटिवों (दवा प्रतिनिधियों) का जमावड़ा नही लगता हो। कुछ चिकित्सक के चेम्बर के बाहर-भीतर तो दवा प्रतिनिधियों और पैथोलॉजी संचालकों के गुर्गे खुद ही मरीजो के पर्ची पर जांच, दवा लिख रहे है। इतना ही नही मरीजों को इस हिदायत के साथ अस्पताल से बाहर भेजा जाता है कि वह बताये गए मेडिकल स्टोर से दवा लें एवं चिन्हित पैथोलॉजी से ही जांच करवाएं। इसके बाद दवा और जांच रिपोर्ट दिखाकर तभी घर जाएं। कुछ चिकित्सक तो मरीज की पर्ची पर इस हैंड राइटिंग में दवा-जांच लिखते है कि कुछ देर बाद वह खुद ही नही पढ़ पाते है। ऐसा नही है कि यह सब प्रकिया नई चल रही है और अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों को पता ही नही है। लेकिन इन आदमखोर चिकित्सकों पर कड़ी कार्रवाई कब होगी मसला यह बड़ा है। देखना यह है कि कुछ भगवान से शैतान का दर्जा प्राप्त करते जा रहें चिकित्सको पर जांचोपरांत कार्यवाई कब तक होती है, कितने चिकित्सको के प्रैक्टिस लाइसेंस निरस्त होते है और कब तक चिकित्सक गरीबो के इलाज पर्ची पर आसानी से पढ़ लिए जाने वाली भाषा में जेनरिक दवाएं और आवश्यकतानुसार ही जांच लिखते है।


