आलमगीर मस्जिद (ज्ञानवापी) या प्राचीन विश्वेश्वर विश्वनाथ मंदिर??

आलमगीर मस्जिद (ज्ञानवापी) या प्राचीन विश्वेश्वर विश्वनाथ मंदिर??
आलमगीर मस्जिद (ज्ञानवापी) या प्राचीन विश्वेश्वर विश्वनाथ मंदिर??
आलमगीर मस्जिद (ज्ञानवापी) या प्राचीन विश्वेश्वर विश्वनाथ मंदिर??
आलमगीर मस्जिद (ज्ञानवापी) या प्राचीन विश्वेश्वर विश्वनाथ मंदिर??
आलमगीर मस्जिद (ज्ञानवापी) या प्राचीन विश्वेश्वर विश्वनाथ मंदिर??

-अनुराग पाण्डेय

ज्ञानवापी मस्जिद जिसे कभी कभी आलमगीर मस्जिद भी कहा जाता है, वाराणसी मे स्थित एक विवादित मस्जिद है। यह मस्जिद, काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी हुई है। 1669 मे मुग़ल आक्रमणकारी औरंगजेब ने प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर यह ज्ञानवापी मस्जिद बना दी। ज्ञानवापी एक संस्कृत शब्द है इसका अर्थ है ज्ञान का कुआं। 1991 से इस मस्जिद को हटाकर मंदिर बनाने की कानूनी लड़ाई चल रही है। पर 2022 मे सर्वे होने बाद ये ज्यादा चर्चों मे है। दावा किया जा रहा की मस्जिद के वाजुखाने मे 12.8 व्यास का शिवलिंग प्राप्त हुआ है जिसे आक्रमण से बचाने के लिए तत्कालीन मुख्य पुजारी ने ज्ञानवापी कूप मे छुपा दिया गया था।

इतिहास के पन्नो से

काशी विश्वनाथ मंदिर और उससे सटी ज्ञानवापी मस्जिद को किसने बनवाया, इसको लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। लेकिन ठोस ऐतिहासिक जानकारी दुर्लभ है। आमतौर पर यह माना जाता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब ने ध्वस्त कर दिया था और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया था। चौथी और पांचवीं शताब्दी के बीच, चंद्रगुप्त द्वितीय, जिसे विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है, ने गुप्त साम्राज्य के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करने का दावा किया है। 635 ईसा पूर्व में, प्रसिद्ध चीनी यात्री हुआन त्सांग ने अपने लेखन में मंदिर और वाराणसी का वर्णन किया। ईसा पूर्व 1194 से 1197 तक, मोहम्मद गोरी के आदेश से मंदिर को काफी हद तक नष्ट कर दिया गया था, और पूरे इतिहास में मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण की एक श्रृंखला शुरू हुई। कई हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया और उनका पुनर्निर्माण किया गया। ईसा पूर्व 1669 में, मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश से, मंदिर को अंततः ध्वस्त कर दिया गया और उसके स्थान पर एक ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया। 1776 और 1978 के बीच, इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने ज्ञानवापी मस्जिद के पास वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया। 1936 में पूरे ज्ञानवापी क्षेत्र में नमाज अदा करने के अधिकार के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जिला न्यायालय में मुकदमा दायर किया गया था। वादी ने सात गवाह पेश किए, जबकि ब्रिटिश सरकार ने पंद्रह गवाह पेश किए। ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज अदा करने का अधिकार स्पष्ट रूप से 15 अगस्त, 1937 को दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि ज्ञानवापी संकुल में ऐसी नमाज कहीं और नहीं पढ़ी जा सकती। 10 अप्रैल 1942 को उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और अन्य पक्षों की अपील को खारिज कर दिया। पंडित सोमनाथ व्यास, डॉ. रामरंग शर्मा और अन्य ने ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और पूजा की स्वतंत्रता के लिए 15 अक्टूबर, 1991 को वाराणसी की अदालत में मुकदमा दायर किया। अंजुमन इंतजमिया मस्जिद और उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड लखनऊ ने 1998 में हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दायर कर इस आदेश को चुनौती दी थी। 7 मार्च 2000 को पंडित सोमनाथ व्यास का निधन हो गया। पूर्व जिला लोक अभियोजक विजय शंकर रस्तोगी को 11 अक्टूबर, 2018 को मामले में वादी नियुक्त किया गया था। 17 अगस्त 2021 मे शहर की 5 महिलाओं राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, मंजू व्यास, सीता साहू और रेखा पाठक ने वाराणसी सत्र न्यायलय में याचिका दायर की थी और ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी का उन्हें नियमित दर्शन पूजन की अनुमति मांगी जिसके बाद मस्जिद मे सर्वे कराया गया।

1669 मे औरंगजेब ने प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर इस मस्जिद का निर्माण करवाया। मंदिर परिसर के ही शृंगार गौरी, श्री गणेश और हनुमानजी के स्थानों को भी ध्वस्त कर दिया था। मान्यता है की पश्चिमी दीवार जो की पूरी तरह किसी मंदिर के मुख्य द्वार जैसा प्रतीत होता है वो शृंगार गौरी मंदिर का प्रवेश द्वार होगा जिससे बांस-मिट्ठी से बंद करदिया गया है और मस्जिद के अंदर गर्भगृह होगा। इसी पश्चिमी दीवार के सामने एक चबूतरा है जहां शृंगार गौरी की एक मूर्ति है जो सिंदूर से रंगी है, यह साल मे एक बार चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन हिन्दू पक्ष के द्वारा यह पूजा होती है परंतु 1991 के पहले यह नियमित पूजा होती थी जिसपर तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने रोक लगा दी थी। 2021 मे पांचों महिलों का इसी मंदिर मे नियमित पूजा करने के लिए याचिका दायर की थी जिसके सर्वे का आदेश कोर्ट द्वारा किया गया था।

1: "समजून घ्या : १९९१ पासून सुरु असणारा काशी विश्वनाथ मंदिर – ज्ञानवापी मशीद वाद आहे तरी काय?". Loksatta (मराठी में). अभिगमन तिथि 2022-05-16.

2: Bharatvarsh, TV9 (2022-05-17). "ज्ञानवापी से शिव का कैसा सरोकार? BHU की प्रोफेसर ने 'स्कंद पुराण' से बताया बड़ा कनेक्शन". TV9 Bharatvarsh. अभिगमन तिथि 2022-05-18.

3: "Gyanvapi Survey: 'ज्ञानवापी जैसा शब्द कुरान-इस्लाम में नहीं', सर्वे पर साक्षी महाराज ने कही ये बात". Zee News. अभिगमन तिथि 2022-05-18.

4: नवभारतटाइम्स.कॉम (2022-05-17). "Gyanvapi Masjid Mystery : ज्ञानवापी क्या है, इस रहस्य को जानकर हैरान रह जाएंगे". नवभारत टाइम्स. अभिगमन तिथि 2022-05-18.

5:"गुप्तकाल से मेल खाती है ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग की संरचना, इतिहासकार का दावा". Hindustan (hindi में). 6:अभिगमन तिथि 2022-05-21.

6:"धार्मिक चरित्र की पहचान से नहीं रोकता 1991 का कानून, ज्ञानवापी केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बड़ी बातें". Navbharat Times. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

7:"मुलायम सिंह यादव ने रुकवाई थी ज्ञानवापी के श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा: BJP नेता का दावा". ऑपइंडिया (अंग्रेज़ी में). 2022-05-13. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

8:"Gyanvapi Survey Report: त्रिशूल, कमल, डमरू.. मस्जिद में हिंदू संस्कृति के प्रतीक चिह्न, ज्ञानवापी की सर्वे रिपोर्ट लीक". Navbharat Times. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

9: Live, A. B. P. (2022-05-19). "Highlights: ज्ञानवापी मस्जिद मामले में कोर्ट कमिश्नर विशाल सिंह ने पेश की सर्वे रिपोर्ट". 10:www.abplive.com. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

11:"सर्वे पर विवाद से लेकर शिवलिंग के दावे तक... ज्ञानवापी को लेकर अबतक क्या-क्या हुआ?". आज तक. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

12: "ज्ञानवापी सर्वे: 'मंदिरों का मलबा, शेषनाग-कमल की कलाकृति', अजय मिश्रा की रिपोर्ट में दावा". आज तक. अभिगमन तिथि 2022-05-21. 13:"Gyanvapi Dispute: पूर्व कमिश्नर अजय मिश्रा ने सर्वे की रिपोर्ट कोर्ट में पेश, कई अहम बातें शामिल". आज तक. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

14: "Gyanvapi News: हमने अपनी रिपोर्ट में शिवलिंग मिलने की बात नहीं लिखी...ज्ञानवापी सर्वे पर विशाल सिंह का बड़ा खुलासा". Navbharat Times. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

15: "ज्ञानवापी मामला : सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे रिपोर्ट पर कहा, 'चुनिंदा लीक बंद होनी चाहिए'". NDTVIndia. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

16: "Gyanvapi Masjid Case LIVE: ज्ञानवापी मस्जिद केस में सुप्रीम कोर्ट अब जुलाई के दूसरे हफ्ते में करेगा सुनवाई". आज तक. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

17 "Gyanvapi Case: ज्ञानवापी केस जिला जज को ट्रांसफर, सील रहेगा 'शिवलिंग' वाला एरिया". आज तक. अभिगमन तिथि 2022-05-21.

ASI सर्वे व ज्ञानवापी पर मुख्यमंत्री का बयान देना कितना सही??? तीन अगस्त से इलाहाबाद हाई कोर्ट इस बात पर फ़ैसला सुनाने जा रहा है कि ज्ञानवापी के परिसर का एएसआई सर्वेक्षण होना चाहिए या नहीं और तीन अगस्त से ही सर्वे का कार्य सुरु हो गया है।

यहाँ तक कि भोपू मीडिया ने मस्जिद से मूर्तिया निकलने की बात भी जोरो से लाइक ,कमेंट, व्यू के कारण खूब चला दी लेकिन यह मात्र अफवाह थी।

हिंदू पक्ष चाहता है कि परिसर का एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण हो.

हिंदू पक्ष के मुताबिक़, इससे ये साबित किया जा सकेगा कि मौजूदा ढांचा एक हिंदू मंदिर पर बनाया गया है.

मुस्लिम पक्ष का विरोध है कि अगर एएसआई सर्वे करती है तो उससे ज्ञानवापी के ढांचे को नुकसान पहुंचेगा।

लेकिन इस बीच निचली अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे तमाम मुकदमों में उलझे ज्ञानवापी मामले पर पहली बार कोई बड़ी राजनीतिक राय सामने आई है।

क्या है ज्ञानवापी का इतिहास?

History of gyanvapi masjid mosque: कहते हैं कि काशी में शिवजी का एक बहुत ही विशालकाय मंदिर था। इसे मध्यकाल में तोड़कर यहां पर एक मस्जिद बना दिए जाने का दावा किया जाता रहा है। आओ जानते हैं काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी

मस्जिद का प्राचीन इतिहास।

1. आदिकाल : हिन्दू पुराणों अनुसार काशी में विशालकाय मंदिर में आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर शिवलिंग स्थापित है।

2. प्राचीनकाल : ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने अपने कार्यकाल में पुन: जीर्णोद्धार करवाया था।

3. 1194 : इस भव्य मंदिर को बाद में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था।

4. 1447 : मंदिर को स्थानीय लोगों ने मिलकर फिर से बनाया परंतु जौनपुर के शर्की सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया और मस्जिद बनाई गई। हालांकि इसको लेकर इतिहासकारों में मतभेद है।

5. 1585 : पुन: राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।

6. 1632 : मंदिर को शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।

7. 1669 : 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। एलपी शर्मा की पुस्तक 'मध्यकालीन भारत' में इस ध्वंस का वर्णन है। साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इसके संकेत मिलते हैं।

8. 1669 : 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई और तब ज्ञानवापी परिसर में मस्जिद बनाई गई।

9. 1735 : मंदिर टूटने के 125 साल तक कोई विश्वनाथ मंदिर नहीं था। इसके बाद साल 1735 में इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई ने ज्ञानवापी परिसर के पास काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया।

10. 1809 : ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद पहली बार गरमाया, जब हिन्दू समुदाय के लोगों द्वारा ज्ञानवापी मस्जिद को उन्हें सौंपने की मांग की।

11. 1810 : 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मिस्टर वाटसन ने 'वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल' को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया।

Kashi Vishwanath Gyanvapi masjid 12. 1829-30 : ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने इसी मंदिर में ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।

13. 1883-84 : ज्ञानवापी मस्जिद का पहला जिक्र राजस्व दस्तावेजों में जामा मस्जिद ज्ञानवापी के तौर पर दर्ज किया गया।

14. 1936 : 1936 में दायर एक मुकदमे पर वर्ष 1937 के फैसले में ज्ञानवापी को मस्जिद के तौर पर स्वीकार किया गया।

15. 1984 : विश्व हिन्दू परिषद् ने कुछ राष्ट्रवादी संगठनों के साथ मिलकर ज्ञानवापी मस्जिद के स्थान पर मंदिर बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया।

16. 1991 : हिन्दू पक्ष की ओर से हरिहर पांडेय, सोमनाथ व्यास और प्रोफेसर रामरंग शर्मा ने मस्जिद और संपूर्ण परिसर में सर्वेक्षण और उपासना के लिए अदालत में एक याचिका दायर की।

17. 1991 : मस्जिद सर्वेक्षण के लिए के लिए दायर की गईं याचिका के बाद संसद ने उपासना स्थल कानून बनाया। तब आदेश दिया कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे में नहीं बदला जा सकता।

18. 1993 : विवाद के चलते इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्टे लगाकर यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया।

19. 1998 : कोर्ट ने मस्जिद के सर्वे की अनुमति दी, जिसे मस्जिद प्रबंधन समिति ने इलाहबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद कोर्ट द्वारा सर्वे की अनुमति रद्द कर दी गई।

20. 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने आदेश की वैधता छह माह के लिए बताई।

21. 2019 : वाराणसी कोर्ट में फिर से इस मामले में सुनवाई शुरू हुई

22. 2021 : कुछ महिलाओं द्वारा कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमे मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा करने की आज्ञा मांगी और सर्वे की मांग की। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दी।

विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

इस स्थान पर हिंदू देवता शिव को समर्पित एक विश्वेश्वर मंदिर था । [5] इसका निर्माण अकबर के एक प्रमुख दरबारी और मंत्री टोडर मल ने 16वीं शताब्दी के अंत में महाराष्ट्र के बनारस के एक प्रमुख ब्राह्मण विद्वान नारायण भट्ट के साथ मिलकर किया था। [6] [7] [ए] मंदिर ने बनारस को ब्राह्मण सभा के एक प्रतिष्ठित केंद्र के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया, जिसने पूरे उपमहाद्वीप के विद्वानों को आकर्षित किया। महाराष्ट्र, हिंदू धार्मिक कानून से संबंधित विभिन्न विवादों का निपटारा करने के लिए।

वास्तुशिल्प इतिहासकार माधुरी देसाई की परिकल्पना है कि मंदिर प्रमुख नुकीले मेहराबों के साथ मुगल वास्तुकला से उधार लिए गए इवानों को काटने की एक प्रणाली थी; इसके बाहरी हिस्से में नक्काशीदार पत्थर था।

मंदिर पूर्व इतिहास

इस मंदिर से पहले इस स्थल पर क्या अस्तित्व रहा होगा, इस पर विद्वानों द्वारा बहस की जाती है। [10] इस तरह के इतिहास का स्थानीय हिंदू और मुस्लिम आबादी द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध किया गया है। देसाई ने मूल मंदिर के कई इतिहासों और ज्ञानवापी के स्थान से उत्पन्न तनावों को ध्यान में रखते हुए शहर की पवित्र स्थलाकृति को मूल रूप से आकार दिया

मस्जिद के इतिहास के हालिया विवरण, जैसा कि हिंदुओं द्वारा प्रसारित किया गया है, [बी] मूल मंदिर के बार-बार विनाश और पुनर्निर्माण के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जो लिंगम की कालातीतता के विपरीत स्थित है। [11] मूल मंदिर, जो मस्जिद के वर्तमान स्थान पर स्थित है, कथित तौर पर 1193/1194 ई. में, कन्नौज के जयचंद्र की हार के बाद, घुरिड्स द्वारा उखाड़ दिया गया था ; कुछ साल बाद इसके स्थान पर रजिया मस्जिद का निर्माण किया गया। [14] [15] मंदिर का पुनर्निर्माण इल्तुतमिश (1211-1266 ई.) के शासनकाल के दौरान एक गुजराती व्यापारी द्वारा किया गया था, जिसे हुसैन शाह शर्की ने ध्वस्त कर दिया था।(1447-1458) जौनपुर सल्तनत का या सिकंदर लोदी (1489-1517) दिल्ली सल्तनत का। [15] अकबर के शासनकाल के दौरान , राजा मान सिंह ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया, [सी] लेकिन यह फिर से औरंगजेब के तीव्र धार्मिक उत्साह का शिकार हो गया।

ऐतिहासिकता

डायना एल. एक ने आदि-विश्वेश्वर परिसर को लिंगम का मूल घर होने की हिंदू धारणा की पुष्टि करने के लिए मध्ययुगीन इतिहास पाया; हालाँकि, विद्वानों ने एक के मध्यकालीन स्रोतों के गैर-प्रासंगिक उपयोग की आलोचना की है। [16] [17] [डी] हंस टी. बेकर का मानना ​​है कि 1194 में नष्ट किया गया मंदिर वास्तव में वर्तमान ज्ञानवापी परिसर में स्थित है लेकिन अविमुक्तेश्वर को समर्पित है; हालाँकि, उनका अनुमान है कि रज़िया मस्जिद का निर्माण उसके स्थान पर नहीं किया गया था, बल्कि निकटवर्ती "विश्वेश्वर की पहाड़ी" के ऊपर किया गया था, जो हिंदुओं को - 13 वीं शताब्दी के अंत में - विश्वेश्वर के मंदिर के लिए खाली ज्ञानवापी स्थल को पुनः प्राप्त करने के लिए मजबूर करेगा। [20]इस नए मंदिर को जौनपुर सल्तनत द्वारा फिर से नष्ट कर दिया जाएगा, जाहिर तौर पर अपनी नई राजधानी में मस्जिदों के लिए निर्माण सामग्री की आपूर्ति करने के लिए।

इसके विपरीत, मध्यकालीन साहित्य के अपने अध्ययन में, देसाई प्रारंभिक-मध्यकालीन बनारस में किसी भी विश्वेश्वर मंदिर के अस्तित्व को खारिज करते हैं; अन्य विद्वानों के साथ उनका तर्क है कि काशीखंड [ई] में ही विश्वेश्वर को पहली बार शहर के प्रमुख देवता के रूप में चित्रित किया गया था और तब भी, सदियों तक, यह बनारस के कई पवित्र स्थानों में से एक बना रहा। [21] [14] [एफ] सोलहवीं शताब्दी के अंत से शुरू होने वाले मुगलों के निरंतर संरक्षण के बाद ही विश्वेश्वर, अविमुक्तेश्वर के स्थान पर शहर का प्रमुख मंदिर बन सका। [23]वह हिंदू दावों को मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा हिंदू सभ्यता पर लगातार अत्याचार किए जाने के बारे में एक मेटा-कथा का हिस्सा मानती है, जिसे ज्ञान उत्पादन के औपनिवेशिक उपकरणों के माध्यम से प्रबलित किया गया था।

ब्रिटिश राज

ब्रिटिश राज के तहत, ज्ञानवापी, जो कभी सनकी मुगल राजनीति का विषय था, स्थानीय हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बारहमासी विवाद के स्थल में बदल गया, जिससे कई कानूनी मुकदमे और यहां तक ​​कि दंगे भी हुए। [60] [61] कुलीनों और धनी व्यापारियों की एक नई पीढ़ी ने शहर के धार्मिक जीवन को नियंत्रित करने में, अक्सर शहरीकरण की आड़ में, मुगल काल के उत्तरार्ध में छोटे शासकों द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका को अपने कब्जे में ले लिया। देसाई कहते हैं, कि मस्जिद के निर्माण ने शहर के धार्मिक क्षेत्र पर मुगल नियंत्रण के बारे में "स्पष्ट रूप से राजनीतिक और दृश्य" दावे को प्रसारित करने की कोशिश की थी, लेकिन इसके बजाय, "विश्वेश्वर को शहर के अनुष्ठान परिदृश्य के निर्विवाद केंद्र में बदल दिया"।

1809 का दंगा, जिसे व्यापक रूप से कंपनी शासन के तहत उत्तर भारत में पहला महत्वपूर्ण दंगा माना जाता है, ने बनारस में प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता के विकास को तेज़ कर दिया। हिंदू समुदाय द्वारा ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर के बीच "तटस्थ" स्थान पर एक मंदिर बनाने के प्रयास से तनाव बढ़ गया। [63] जल्द ही, होली और मुहर्रम का त्यौहार एक ही दिन पड़ गया और मौज-मस्ती करने वालों के टकराव ने दंगे को भड़का दिया। [63] एक मुस्लिम भीड़ ने ज्ञानवापी कुएं के पवित्र जल को खराब करने के लिए - हिंदुओं के लिए पवित्र - एक गाय को मार डाला; एक हिंदू भीड़ ने ज्ञानवापी मस्जिद में आगजनी करने और फिर उसे ध्वस्त करने का प्रयास किया। अंग्रेजों से पहले कई मौतें हुईं और लाखों की संपत्ति का नुकसान हुआप्रशासन ने दंगा शांत कराया।

सितंबर 1824 में दौरा करते हुए, रेजिनाल्ड हेबर ने पाया कि यह चबूतरा अहिल्याबाई के मंदिर से भी अधिक पूजनीय है और पुजारियों और भक्तों से भरा हुआ है; गंगा के भूमिगत चैनल द्वारा पोषित "कुआँ" में भक्तों के उतरने और स्नान करने के लिए एक सीढ़ी थी। [65] चार साल बाद, मराठा शासक दौलत राव सिंधिया की विधवा बैजा बाई ने कुएं के चारों ओर एक मंडप का निर्माण किया - इसे आकार में छोटा कर दिया - और एक छत का समर्थन करने के लिए एक स्तंभ खड़ा किया , एक सदस्य द्वारा उठाए गए प्रस्ताव के अनुसार। पेशवा परिवार. [25] [29] स्तंभ काशीखंड में उल्लिखित ज्ञान मंडप पर आधारित था, लेकिन स्थापत्य शैली समकालीन मुगल बारादरी से उधार ली गई थी।. [o] इसके पूर्व में, नंदी की एक मूर्ति थी, जिसे नेपाल के राणा ने उपहार में दिया था। [67] आगे पूर्व की ओर, महादेव का एक मंदिर हैदराबाद की रानी द्वारा बनवाया गया था। [67] दक्षिण में, दो छोटे मंदिर मौजूद थे - एक संगमरमर का, और दूसरा पत्थर का।

ऐसा प्रतीत होता है कि पहला कानूनी विवाद 1854 में उत्पन्न हुआ था, जब स्थानीय अदालत ने परिसर में एक नई मूर्ति स्थापित करने की याचिका खारिज कर दी थी। [68] [पी] उसी वर्ष, एक बंगाली तीर्थयात्री ने कहा कि परिसर तक पहुंचने के लिए मुस्लिम गार्डों को "या तो रिश्वत दी जाती थी या उनकी आंखों में धूल झोंकी जाती थी"। [60] एमए शेरिंग, [क्यू] ने 1868 में लिखते हुए कहा कि हिंदुओं ने चबूतरे के साथ-साथ दक्षिणी दीवार पर भी दावा किया है; मुसलमानों को मस्जिद पर नियंत्रण स्थापित करने की अनुमति दी गई, लेकिन बहुत अनिच्छा से, और केवल पार्श्व प्रवेश द्वार का उपयोग करने की अनुमति दी गई। [69] [आर] प्रवेश द्वार के ऊपर लगे पीपल के पेड़ की भी पूजा की जाती थी, और मुसलमानों को "इसमें से एक भी पत्ता तोड़ने" की अनुमति नहीं थी । [60]1886 में, अवैध निर्माणों के विवाद पर फैसला सुनाते हुए, जिला मजिस्ट्रेट ने माना कि मस्जिद के विपरीत, जो विशेष रूप से मुसलमानों का था, घेरा एक सामान्य स्थान था, जिससे किसी भी एकतरफा और अभिनव उपयोग को रोका जा सकता था। [71] [68] यह सिद्धांत अगले कुछ दशकों में कई मामलों का फैसला करता रहेगा।

1909 में एडविन ग्रीव्स ने इस स्थल का दौरा करते हुए पाया कि मस्जिद का "बहुत अधिक उपयोग नहीं किया गया" था, और यह हिंदुओं के लिए "आंखों की किरकिरी" बनी हुई थी। मंडप के बारे में उनका वर्णन शेरिंग के वर्णन के समान है। [73] इस कुएं ने भी महत्वपूर्ण श्रद्धा अर्जित की - तीर्थयात्रियों को एक पुजारी से इसका पवित्र जल प्राप्त हुआ, जो बगल के पत्थर की स्क्रीन पर बैठा था; आत्महत्याओं को रोकने के लिए कुएं को लोहे की रेलिंग से भी ढक दिया गया था और भक्तों को पानी तक सीधे पहुंचने की अनुमति नहीं थी। इस बीच, कानूनी विवाद निरंतर जारी रहे।

1929 और 1930 में, मौलवी को चेतावनी दी गई थी कि जुमुआतुल-विदा के अवसर पर भीड़ को बाड़े में न घुसने दें , ऐसा न हो कि हिंदू तीर्थयात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़े। इसके बाद, जनवरी 1935 में, मस्जिद समिति ने जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष असफल रूप से मांग की कि भीड़-भाड़ पर प्रतिबंध हटा दिया जाए; अक्टूबर में, यह मांग की गई, लेकिन असफल रही, कि मुसलमानों को परिसर में कहीं भी प्रार्थना करने की अनुमति दी जाए। दिसंबर 1935 में, मस्जिद के बाहर नमाज़ पढ़ने से रोके जाने पर स्थानीय मुसलमानों ने पुलिस पर हमला कर दिया, जिसमें कई अधिकारी घायल हो गए। इससे एक मुकदमे का रास्ता खुल गया, जिसमें आग्रह किया गया कि पूरे परिसर को मस्जिद - वक्फ - का अभिन्न अंग माना जाए।संपत्ति - प्रथागत अधिकारों द्वारा, यदि कानूनी अधिकारों द्वारा नहीं; अगस्त 1937 में निचली अदालत द्वारा विवाद को खारिज कर दिया गया था और 1941 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लागत सहित एक अपील खारिज कर दी थी ।