वाराणसी "काशी" क्या है काशी का रहस्य आइये जाने काशी की कुछ प्राचीन,वैदिक ,भगवान शिव से जुड़ी बातें व क्या है नागलोक का रहस्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने लगभग ५००० वर्ष पूर्व की थी, जिस कारण ये आज एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। स्कन्द पुराण, रामायण एवं महाभारत सहित प्राचीनतम ऋग्वेद में नगर का उल्लेख आता है नागपंचमी विशेषांक 2024 -जगदीश शुक्ला
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जगदीश शुक्ला
नागपंचमी 2024 विशेषांक
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग काशी में है जिसे बाबा विश्वनाथ कहते हैं। काशी को बनारस और वाराणसी भी कहते हैं। शिव और काल भैरव की यह नगरी अद्भुत है जिसे सप्तपुरियों में शामिल किया गया है। दो नदियों 'वरुणा' और 'असि' के मध्य बसे होने के कारण इसका नाम 'वाराणसी' पड़ा। आओ जानते हैं इस हिन्दू तीर्थ के बारे में 10 अद्भुत बातें।
1.शिव के त्रिशुल पर बसी काशी कहते हैं कि गंगा किनारे बसी काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशुल की नोक पर बसी है जहां बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक काशी विश्वनाथ विराजमान हैं। पतित पावनी भागीरथी गंगा के तट पर धनुषाकारी बसी हुई यह काशी नगरी वास्तव में पाप-नाशिनी है। भगवान शंकर को यह गद्दी अत्यन्त प्रिय है इसीलिए उन्होंने इसे अपनी राजधानी एवं अपना नाम काशीनाथ रखा है।
2. विष्णु की पुरी पुराणों के अनुसार पहले यह भगवान विष्णु की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदु सरोवर बन गया और प्रभु यहां 'बिंधुमाधव' के नाम से प्रतिष्ठित हुए। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास स्थान बन गई। काशी में हिन्दुओं का पवित्र स्थान है 'काशी विश्वनाथ'। कहते हैं कि विष्णु ने अपने चिन्तन से यहां एक पुष्कर्णी का निर्माण किया और लगभग पचास हजार वर्षों तक वे यहां घोर तपस्या करते रहे।
3.ध्वस्थ कर दिया था यहां का मंदिर चीनी यात्री (ह्वेनसांग) के अनुसार उसके समय में काशी में सौ मंदिर थे, किन्तु मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सभी मंदिर ध्वस्त कर मस्जिदों का निर्माण किया। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।
डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।
4.काशी के कोतवाल भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। काशी विश्वनाथ में दर्शन से पहले भैरव के दर्शन करना होते हैं तभी दर्शन का महत्व माना जाता है। उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव।
5.काशी में मिलता है मोक्ष ऐसी मान्यता है कि वाराणसी या काशी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्तिदायक तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। इसीलिए अधिकतर लोग यहां काशी में अपने जीवन का अंतिम वक्त बीताने के लिए आते हैं और मरने तक यहीं रहते हैं। इसके काशी में पर्याप्त व्यव्था की गई है। वाराणसी कई शताब्दियों से हिन्दू मोक्ष तीर्थस्थल माना जाता है। शास्त्र मतानुसार जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो मोक्ष हेतु मृतक की अस्थियां यहीं पर गंगा में विसर्जित की जाती हैं। यह शहर सप्तमोक्षदायिनी नगरी में एक है।
6.भारत का सबसे प्राचीन शहर काशी इजिप्ट (मिस्र), बगदाद, देहरान, मक्का, रोम, एथेंस, येरुशलम, बाइब्लोस, जेरिको, मोहन-जोदड़ो, हड़प्पा, लोनान, मोसुल आदि नगरों की दुनिया के प्राचीन नगरों में गिनती की जाती है, लेकिन पौराणिक और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार दुनिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी है। दुनिया न भी माने, तो यह भारत का सबसे प्राचीन शहर है।
शहरों और नगरों में बसाहट के अब तक प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर एशिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी को ही माना जाता है। इसमें लोगों के निवास के प्रमाण 3,000 साल से अधिक पुराने हैं। हालांकि कुछ विद्वान इसे करीब 5,000 साल पुराना मानते हैं, लेकिन हिन्दू धर्मग्रंथों में मिलने वाले उल्लेख के अनुसार यह और भी पुराना शहर है। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है। इसका उल्लेख उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।
7.महात्मा और संतों की नगरी भगवान बुद्ध ने बोध गया में ज्ञान प्राप्त कर यहीं पर अपना पहला प्रवचन दिया और जैनियों के तीन तीर्थंकरो का जन्म यहीं हुआ इसीलिए यह तीनों धर्मों के लिए पवित्र स्थल है। कबीर ने यहीं पर बैठकर अपने संदेश को दुनिया में फैलाया। तुलसीदास जी ने यहीं बैठकर रामचरित मानस की रचना की। इस तरह काशी कई महात्मा और संतों की पुण्य स्थली है। भगवान बुद्ध और शंकराचार्य के अलावा रामानुज, वल्लभाचार्य, संत कबीर, गुरु नानक, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, रैदास आदि अनेक संत इस नगरी में आए। एक काल में यह हिन्दू धर्म का प्रमुख सत्संग और शास्त्रार्थ का स्थान बन गया था। संस्कृत पढ़ने के लिए प्राचीनकाल से ही लोग वाराणसी आया करते थे।
8.संगीत घरानों की नगरी वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी संगीत में अपनी ही शैली है। सन् 1194 में शहाबुद्दीन गौरी ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुंचाई। मुगलकाल में इसका नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया।
9.बनारसी पान, बाबू और साड़ी दुनिया में प्रसिद्ध काशी को बनारस भी कहते हैं। यहां का बनारसी पान, बनारसी सिल्क साड़ी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संपूर्ण भारत में ही नहीं, विदेश में भी अपनी प्रसिद्धि के लिए चर्चित है। यहां के लोग भी अद्भुत होते हैं, जिन्हें बनारसी बाबू कहते हैं। इनका व्यवहार बहुत मीठा और ज्ञानपूर्ण होता है। दिमाग से तेज होते हैं बनारसी बाबू। देखा जाए तो काशी बहुत बड़े नेता, अभिनेता, गायक, संगीतकार, नृत्यकार और कलाकारों की नगरी है।
10. उत्तरकाशी भी काशी उत्तरकाशी को भी छोटा काशी कहा जाता है। ऋषिकेश उत्तरकाशी जिले का मुख्य स्थान है। उत्तरकाशी जिले का एक भाग बड़कोट एक समय पर गढ़वाल राज्य का हिस्सा था। बड़कोट आज उत्तरकाशी का काफी महत्वपूर्ण शहर है। उत्तरकाशी की भूमि सदियों से भारतीय साधु-संतों के लिए आध्यात्मिक अनुभूति की और तपस्या स्थली रही है। दुनियाभर से लोग यहां वैदिक भाषा सीखने के लिए आते रहे हैं। महाभारत के अनुसार उत्तरकाशी में ही एक महान साधु जड़ भारत ने यहां घोर तपस्या की थी। स्कंद पुराण के केदारखंड में उत्तरकाशी और भागीरथी, जाह्नवी व भीलगंगा के बारे में वर्णन है।
काशी की उत्पत्ति
काशी से जुड़ी सबसे पुरानी मान्यता ये है कि इस नगरी को शिव के त्रिशूल पर बसाया गया है। शिव ने अपने त्रिशूल को सामने किया और उसके बाद काशी नगरी का निर्माण हुआ। यही कारण है कि इस नगरी को हिंदू धर्म के लिए बहुत विशेष माना जाता है।
क्या है? प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर के पीछे की कहानी
देवी पार्वती ने एक दिन भगवना शिव से उन्हें अपने घर ले जाने के लिए कहा. भगवान शिव ने देवी पार्वती की बात मानकर उन्हें काशी लेकर आए और यहां विश्वनाथ-ज्योतिर्लिंग के रूप में खुद को स्थापित कर लिया. जिसका जीर्णोद्धार 11 वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने करवाया था और वर्ष 1194 में मुहम्मद गौरी ने ही इसे तुड़वा दिया था।
शिव ने काशी को क्यों छोड़ा?
एक सुंदर कहानी है। एक बार शिव कुछ कारणों से काशी छोड़कर चले गए । देवताओं को डर था कि अगर काशी का प्रबंधन ठीक से नहीं हुआ तो इसकी महिमा खत्म हो जाएगी , इसलिए उन्होंने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी।
बनारस से गंगा जल क्यों नहीं लाया जाता है?
अगर आप काशी से गंगाजल ले जाते हैं और उस पानी में मृतक आत्मा के अंग, राख या अवशेष आ जाते हैं तो मृतक का मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्र बाधित होगा। इस वजह से आत्मा को पूरी तरह से मोक्ष नहीं मिल पाता है। काशी के जीवमात्र को उनके मोक्ष के इस अधिकार से वंचित करना महापाप माना जाता है।
कहाँ है असली काशी?
काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है। यह वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत में स्थित है। यह मंदिर पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है, और बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो शिव मंदिरों में सबसे पवित्र है।
कौन सा जिला है काशी की बहन?
काशी की छोटी बहन गाजीपुर शहर को कहते हैं। गाजीपुर को काशी के समकालीन मानाने का अभिप्राय इस नगरी का धार्मिक होना तथा वाराणसी की संस्कृति से समानता रखना।
गाजीपुर को काशी की बहन क्यों कहते हैं?
गाजीपुर भी बनारस की तरह पौराणिक मान्यता, धार्मिक, एवं गंगा घाट की वजह से बनारस की संस्कृति से समानता रखता है... एंव प्राचीन काल से वाराणसी खण्ड क्षेत्र का भाग है.. काशी से समानता रखने के कारण ही इसे काशी की छोटी बहन या लहूरी काशी कहते हैं...
काशी करवट क्यों हुआ था?
भगवान कृष्ण प्रसन्न हुए मोरंग ध्वज को दर्शन दिया और बच्चे को भी पुर्नजीवित किया और राजा को आशीर्वाद दिया कि अब तुम्हारा जन्म नहीं हो तुमको मोक्ष मिले. ऐसे में मोक्ष की प्राप्ति के लिए मोरंग ध्वज उसी आरे को लेकर काशी आए और काशी में खुद को चीर करके प्राण दान किए. वह स्थान है, जिसे काशी करवत बोला जाता है।
नागलोक का रास्ता जाता है इस गहरे कुएं से, साल में 1 दिन के लिए दर्शन देते हैं चमत्कारी रूप से भोलेनाथ और ले लेते हैं जल समाधि
Naglok In Varanasi : नाग पंचमी पर वाराणसी में स्थित नवापुरा जगह है, जहां पर कारकोटक नागी तीर्थनागकूप है। इसे नागी तीर्थ को नागलोक जाने का रास्ता माना जाता है। वहीं, इस कूप के बारे में यह भी माना जाता है कि इस कुएं से होते हुए पातालोक में भी पहुंचा जा सकता है। आइए, जानते हैं नागलोक जाने के रास्ते और इस कुएं से जुड़ीं खास बातें।
नाग पंचमी इस साल 9 अगस्त, शुक्रवार को है। पौराणिक मान्यता है कि नागपंचमी के दिन नागों की पूजा की जाती है। इस दिन नागों की पूजा इसलिए भी है क्योंकि माना जाता है कि इस पृथ्वीलोक को शेषनाग ने अपने फन पर उठा रखा है, इसलिए नाग पंचमी पर धरती पर रहने वाले नागों का आभार व्यक्त किया जाता है। इसी के साथ नाग पंचमी और नागों से जुड़ीं ऐसी कई कहानियां हैं, जो बहुत ही प्रसिद्ध हैं। एक ऐसी ही कहानी है नागलोक से जुड़ी हुई। काशी में एक ऐसा कुआं है, जहां का रास्ता नागलोक से होकर जाता है। स्कंद पुराण में भी इस जगह का वर्णन मिलता है।
काशी यानी वर्तमान वाराणसी में नवापुरा नामक एक स्थान है, जहां पर नागकूप स्थित है। कारकोटक नागी तीर्थनागकूप, जिसे नागी तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है। यह कूप अपनी अथाह गहराई के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इस कूप का सम्बध पाताल लोक से है। इस कूप के बारे में कहा जाता है कि इस अगर कोई व्यक्ति नागलोक जाना चाहता है, तो नागकूप से होकर जा सकता है।
स्कंद पुराण में इसे बताया गया है पाताल लोक का रास्ता
काल सर्प दोष की पूजा के लिए पूरी दुनिया में सिर्फ तीन जगहें हैं। इनमें से एक कुंड सबसे महत्वपूर्ण है। कहता है कि यहीं से पाताल लोक जाता है। कहते हैं इस कुंड के अंदर सात और कुंड हैं। माना जाता है कि यहां से पाताल लोक जाया जा सकता है। हालांकि, कोई भी इस रास्ते पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है क्योंकि कोई भी व्यक्ति इस रास्ते को पार नहीं कर सकता।
नागपंचमी के दिन पंतजलि भगवान सर्प रूप में आते हैं। इन्हें महादेव का अवतार भी माना जाता है। लोग भगवान के दर्शन करने के लिए बगल में नागकूपेश्वर भगवान की परिक्रमा करते हैं। भक्तों की गहरी आस्था है कि नाग पंचमी के दिन भगवान पंतजलि के दर्शन मात्र से सारे दुख दूर हो जाते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
पाताललोक में जाने वाले इस कूप में कुछ लोग दूध और लावा भी चढ़ाते हैं। उनका मानना है कि इससे पाताल लोक में रहने वाले शेषनाग की कृपा उन पर बनी रहती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस कुएं के आसपास कई प्रजाति के सांप भी निकलते रहते हैं लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि ये नाग किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते।
Disclaimer: यह दी गयी सभी जानकारी वेदों,व अन्य स्रोतों व मान्यताओंके आधार पर लिखी गयी है।


