हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ आदेश देने पर 'प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय, कानपुर नगर ' को हाई कोर्ट ने लगाई फटकार

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जाती हैं कि वह हाई कोर्ट का आदेश अनुपालन करने के बजाए वह उसकी व्याख्या करे- उच्च न्यायालय:शिव विशाल गुप्ता

हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ आदेश देने पर  'प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय, कानपुर नगर ' को हाई कोर्ट ने लगाई फटकार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय

INDIA NEWS REPORT

शिव विशाल गुप्ता

 मामला पनकी कानपुर निवासी श्रीमती रेनू कुमारी का है, जिन्होंने ने अपने पति संतोष कुमार से अपने और तीन बच्चों के मेंटेनेंस क लिए 125 दंड प्रक्रिया संहिता का केस प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय कानपुर नगर की कोर्ट में २०१५ में दाखिल किया था। जिस पर दिनांक 12/09/22 को परिवार न्यायालय ने निर्णय दिया और पति को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी और और तीन बच्चों को प्रार्थना पत्र के दिनांक से 3000-3000 हजार एवं आदेश की तारीख से 5000-5000 हजार रुपए दे। इस आदेश के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में रिवीजन दाखिल किया। हाई कोर्ट ने अपने आदेश दिनांक 11/7/23 में यह देखते हुए कि पति घरेलू हिंसा के केस में 13000/महीने में दे रहा है मेंटेनेंस अमाउंट को घटा कर 9000/ मासिक कर दिया। इस आदेश के बाद पत्नी ने परिवार न्यायालय कानपुर में मेंटेनेंस अमाउंट की रिकवरी के लिए आवेदन किया जिस पर परिवार न्यायालय ने दिनांक 18/11/23 एक आदेश पारित किया और कहा कि वादिनी और उसके बच्चे दोनों केस में मेंटेनेंस के अधिकारी नहीं हैं। इस आदेश के खिलाफ वादनी ने हाई कोर्ट में केस दाखिला किया जिसकी बहस प्रार्थनी के अधिवक्ता जयंत कुमार द्विवेदी ने न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की कोर्ट में दिनांक 16/12/25 को की। प्रार्थनी के अधिवक्ता जयंत कुमार द्विवेदी के तर्कों से कोर्ट ने सहमति व्यक्त की एवं हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय कानपुर के आदेश दिनांक 18/11/23 पर बहुत नाराजगी जताई और कहा कि यह आदेश गलत है एवं न्यायिक अनुशासन के खिलाफ है, जबकि इस कोर्ट का आदेश दिनांक 11/7/23 स्पष्ट है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जाती हैं कि वह हाई कोर्ट का आदेश अनुपालन करने के बजाए वह उसकी व्याख्या करे। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट का यह कहना की प्रार्थनीय और उसके बच्चे दोनों केस में मेंटेनेंस के अधिकारी नहीं हैं एकदम गलत है। उपरोक के आधार पर हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय कानपुर नगर के आदेश से उस हिस्से को समाप्त कर दिया जिसमे यह कहा गया था कि प्रार्थनी और उसके बच्चे दोनों केस में मेंटेनेंस के अधिकारी नहीं हैं।