गांधी जयंती के साथ ही आज देशभर में लाल बहादुर शास्त्री की जयंती भी मनाई जा रही है आइये जाने नाम के साथ क्यों नही लगाते थे सरनेम शास्त्री जी
लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर विशेष,क्या आपको मालूम है कि शास्त्री जी ने कभी अपने नाम के साथ अपने जाति का नाम नहीं लगाया: इंडिया न्यूज रिपोर्ट से अनुराग पाण्डेय
-अनुराग पाण्डेय
देशभर में आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन मनाया जा रहा है. वह एक सीधी, सरल, सच्ची और निर्मल छवि वाले इंसान थे. उनकी ईमानदारी और खुद्दारी की लोग आज भी मिसाल देते हैं। क्या आपको मालूम है कि शास्त्री जी ने कभी अपने नाम के साथ अपने जाति का नाम नहीं लगाया।
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय शहर में हुआ. शास्त्री जी का जन्म एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम शारदा प्रसाद श्रीवास्तव था. वो एक स्कूल में टीचर थे, बाद में उन्होंने इलाहाबाद के राजस्व विभाग में क्लर्क की नौकरी कर ली।
लाल बहादुर शास्त्री के बचपन का नाम लाल बहादुर वर्मा था. कायस्थ परिवार में श्रीवास्तव और वर्मा सरनेम लगाने की परंपरा रही है. इसी के चलते मां-बाप ने उनका नाम लाल बहादुर वर्मा रखा. लाल बहादुर वर्मा के लाल बहादुर शास्त्री बनने की दिलचस्प कहानी है।
लाल बहादुर बचपन से ही पढ़ने-लिखने में काफी तेज थे. 1906 में जब लाल बहादुर की उम्र सिर्फ एक साल और 6 महीने थी, उनके सिर से पिता का साया उठ गया. वो अपनी मां रामदुलारी देवी के साथ अपने ननिहाल मुगलसराय आ गए. शास्त्री जी पढ़ाई लिखाई अपने ननिहाल में हुई।
उनके नाना मुंशी हजारी लाल मुगलसराय के एक सरकारी स्कूल में अंग्रेजी के टीचर थे. 1908 में लाल बहादुर के नाना हजारी लाल का भी निधन हो गया. इसके बाद उनके परिवार की देखभाल हजारीलाल के भाई दरबारी लाल और उनके बेटे बिंदेश्वरी प्रसाद ने की. बिंदेश्वरी प्रसाद भी मुगलसराय के एक स्कूल में टीचर थे।
जब लाल बहादुर शास्त्री महज 06 महीने के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया. जब वह हाईस्कूल करने बनारस के हरीशचंद्र कॉलेज गए तो उन्होंने अपना सरनेम हटा दिया।
बचपन में मौलवी से उर्दू की तालीम ली
लाल बहादुर की पढ़ाई लिखाई 4 साल की उम्र से शुरू हुई. उस वक्त कायस्थ परिवारों में अंग्रेजी से ज्यादा उर्दू भाषा की शिक्षा देने की परंपरा थी. ऐसा इसलिए था क्योंकि मुगलकाल से भारत में राजकाज की भाषा उर्दू ही हुआ करती थी. जमींदारी के सारे काम-काज उर्दू में होते थे. लाल बहादुर को बुड्ढन मियां नाम के एक मौलवी ने उर्दू की तालीम देनी शुरू की।
हाईस्कूल में पढ़ते समय सरनेम छोड़ दिया
छठी क्लास तक उनकी पढाई-लिखाई मुगलसराय में ही हुई. उसके बाद बिंदेश्वरी प्रसाद का ट्रांसफर वाराणसी हो गया. लाल बहादुर को अपनी मां और भाइयों के साथ वाराणसी जाना पड़ा. वाराणसी के हरीश चंद्र हाईस्कूल में सातवीं क्लास में उनका दाखिला हुआ. यही वो वक्त था जब लाल बहादुर ने अपना सरनेम वर्मा छोड़ने का फैसला लिया।
जब वह हाईस्कूल में थे, तभी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. उनके शुरुआती राजनीतिक गुरु जेबी कृपलानी थे. जिनके जरिए वो गांधीजी के संपर्क में आए. (विकी कामंस)
लाल बहादुर के परिवार का स्वतंत्रता आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था. लेकिन हरीश चंद्र हाई स्कूल का माहौल बड़ा देशभक्तिपूर्ण था. वहां के टीचर निष्कामेश्वर मिश्रा बच्चों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाते. लाल बहादुर पर इन सबका बड़ा असर पड़ा. वो स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए।
स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े जनवरी 1921 में जब लाल बहादुर 10वीं क्लास में थे, उन्होंने वाराणसी में महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. वो गांधीजी से इतने प्रभावित हुए कि दूसरे ही दिन स्कूल छोड़कर स्थानीय कांग्रेस दफ्तर में जाकर पार्टी की सदस्यता ले ली. इस तरह लाल बहादुर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े. जल्द ही अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. बाद में उनकी कम उम्र को देखते हुए उन्हें रिहा कर दिया गया।
उस वक्त लाल बहादुर को गाइड करने वाले जेबी कृपलानी हुआ करते थे. जेबी कृपलानी महात्मा गांधी के करीबी नेताओं में से थे. वाराणसी में युवाओं की पढ़ाई-लिखाई को ध्यान में रखते हुए कृपलानी ने अपने मित्र वीएन शर्मा की मदद से राष्ट्रवादी शिक्षा देने की तैयारी शुरू की. स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस पार्टी की आर्थिक मदद देने के लिए मशहूर धनाढ्य शिव प्रसाद गुप्ता ने इस दिशा में काफी मदद की।
दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन किया
उनकी मदद से महात्मा गांधी ने वाराणसी में 10 फरवरी 1921 को काशी विद्यापीठ की स्थापना की. इसका मकसद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े युवाओं को राष्ट्रवादी शिक्षा देना था. लाल बहादुर ने काशी विद्यापीठ में एडमिशन लिया. यहां से उन्होंने नैतिक और दर्शन शास्त्र में 1925 में ग्रेजुएशन की डिग्री ली।
और इस तरह शास्त्री टाइटल को नाम से जोड़ा
लाल बहादुर को 'शास्त्री' का टाइटल मिला. काशी विद्यापीठ में ग्रैजुएट डिग्री के बतौर शास्त्री टाइटल मिलता था. इसी के बाद लाल बहादुर ने अपने नाम से लगा वर्मा टाइटल हटाकर शास्त्री टाइटल जोड़ लिया. इसके बाद लाल बहादुर वर्मा, लाल बहादुर शास्त्री के नाम से मशहूर हुए।
लाल बहादुर के कई और किस्से भी हैं।
जब चपरासी ने थप्पड़ मारा
बनारस के हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान उन्होंने साइंस प्रैक्टिकल में इस्तेमाल होने वाले बीकर को तोड़ दिया था. स्कूल के चपरासी देवीलाल ने उनको देख लिया और उन्हें जोरदार थप्पड़ मार दिया. रेल मंत्री बनने के बाद 1954 में एक कार्यक्रम में भाग लेने आए शास्त्री जी जब मंच पर थे, तो देवीलाल उनको देखते ही हट गए. शास्त्री जी ने भी उन्हें पहचान लिया और देवीलाल को मंच पर बुलाकर गले लगा लिया।
गंगा तैरकर जाते थे स्कूल
बनारस में पैदा हुए शास्त्री का स्कूल गंगा की दूसरी तरफ था. उनके पास गंगा नदी पार करने के लिए फेरी के पैसे नहीं होते थे. इसलिए वह दिन में दो बार अपनी किताबें सिर पर बांधकर तैरकर नदी पार करते थे और स्कूल जाते थे।
फटे कपड़ों से रुमाल बनवाते थे
कहा जाता है कि शास्त्री फटे कपड़ों से बाद में रूमाल बनवाते थे. फटे कुर्तों को कोट के नीचे पहनते थे. इस पर जब उनकी पत्नी ने उन्हें टोका, तो उनका कहना था कि देश में बहुत ऐसे लोग हैं, जो इसी तरह गुजारा करते हैं।
शादी में लिया ये दहेज
लाल बहादुर शास्त्री, बापू को अपना आदर्श मानते थे. उन्हें खादी से इतना लगाव था कि अपनी शादी में दहेज के तौर पर उन्होंने खादी के कपड़े और चरखा लिया था।
थर्ड क्लास रेड में यात्रा की
लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री, गृह मंत्री और रेल मंत्री जैसे अहम पदों पर थे. एक बार वे रेल की एसी बोगी में सफर कर रहे थे. इस दौरान वे यात्रियों की समस्या जानने के लिए थर्ड क्लास (जनरल बोगी) में चले गए. वहां उन्होंने यात्रियों की दिक्कतों को देखा. उन्होंने जनरल बोगी में सफर करने वाले यात्रियों के लिए पंखा लगवा दिया, पैंट्री की सुविधा भी शुरू करवाई।
पकवान नहीं खाते थे
शास्त्री जी किसी भी प्रोग्राम में वीवीआईपी की तरह नहीं, बल्कि एक आम इंसान की तरह जाना पसंद करते थे. प्रोग्राम में उनके लिए तरह-तरह के पकवानों का इंतजाम किया जाता था. लेकिन, शास्त्री जी कभी नहीं खाते थे. उनका कहना था कि गरीब आदमी भूखा सोया होगा और मै मंत्री होकर पकवान खाऊं, ये अच्छा नहीं लगता. दोपहर के खाने में वे अक्सर सब्जी-रोटी खाते थे।
एक दिन व्रत की अपील की
शास्त्री ने युद्ध के दौरान देशवासियों से अपील की थी कि अन्न संकट से उबरने के लिए सभी देशवासी सप्ताह में एक दिन का व्रत रखें. उनके अपील पर देशवासियों ने सोमवार को व्रत रखना शुरू कर दिया था।
और इस तरह पहली बार काशी में अपने घर गए
प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री पहली बार काशी अपने घर आ रहे थे. उनके घर तक जाने वाली गलियां काफी संकरी थीं, जिस कारण उनकी गाड़ी वहां तक नहीं पहुंच पाती. ऐसे में पुलिस-प्रशासन ने गलियों को चौड़ा करने का फैसला किया. यह बात शास्त्री को मालूम हुई, तो उन्होंने आदेश दिया कि गलियों को चौड़ा करने के लिए किसी भी मकान को तोड़ा न जाए. वह पैदल ही घर जाएंगे।


