जहाँ सूर्य की पहली किरण पड़ती है लोलार्क कुंड
लोकमान्यता है कि काशी में भगवान सूर्य की किरणें सबसे पहले लोलार्क कुंड में ही पड़ती हैं और इसी कुंड में सूर्य का चक्र भी गिरा था। :जयचन्द की खास रिपोर्ट
जयचन्द की खास रिपोर्ट
वाराणसी। शिव की नगरी काशी में लोक कल्याण के लिए द्वादश आदित्य भी विराजमान हैं। भदैनी से लेकर अलईपुरा तक ये द्वादश आदित्य के मंदिर स्थापित हैं। काशी खंड के अनुसार मंदिरों को कई देवताओं ने प्रतिष्ठित किया है।
लोकमान्यता है कि काशी में भगवान सूर्य की किरणें सबसे पहले लोलार्क कुंड में ही पड़ती हैं और इसी कुंड में सूर्य का चक्र भी गिरा था।
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के सदस्य पं. दीपक मालवीय ने बताया कि संतति की कामना व आरोग्य के लिए सूर्य षष्ठी (डाला छठ) में भगवान भास्कर की पूजा होती है। यह व्रत सर्वप्रथम द्वापर में माता कुंती ने किया था।
वस्तुतः सूर्योपासना की परंपरा हमारे यहां वैदिक काल से है। सनातन धर्म में प्रत्यक्ष देव स्वरूप में भगवान सूर्य का पूजन होता है। काशी में तो भगवान भास्कर के बारह स्वरूपों की पूजा होती है।
काशी में द्वादश आदित्य लोलार्कादित्य (लोलार्क कुंड-भदैनी) काशी में सर्वप्रथम लोलार्कादित्य ने प्रवेश किया।
मान्यता है कि भगवान शिव की आज्ञा से जब वह काशी में आए तो उनका मन काशी को देखकर मुग्ध हो गया और वह यहीं बस गए। सर्वप्रथम प्रतिष्ठित मंदिर मूर्ति का नाम लोलार्क पड़ा और समीपस्थ कुंड का नाम लोलार्क है।
विमलादित्य (जंगमबाड़ी-खारी कुआं)
काशी खंड के अनुसार विमलादित्य दर्शन करने वालों के समस्त दुखों को दूर करने वाले हैं। मान्यता है कि भगवान सूर्य यहां पर विराजते हैं। भक्तों पर अपना आशीष बरसाते रहते हैं।
सांबादित्य (सूरज कुंड)
कृष्णपुत्र सांब को काशी में जिस स्थान पर मुक्ति मिली वहीं पर सांबादित्य का मंदिर विराजमान है।
कृष्णशापमोचनार्थ कृष्ण के आदेश से सर्वपापघ्नी काशी पुरी में जाकर सांब ने उपासना की। सूरज- कुंड मोहल्ले में
सूर्य-मंदिर के पास है। 50-60 साल पहले चर्मरोग से मुक्ति पाने के लिए वर्ष पर्यंत सूरज-कुंड में लोग स्नान किया करते थे।
उत्तरार्कादित्य (बकरिया कुंड-अलईपुर)
उत्तरार्क का मंदिर, प्रसिद्ध बकरियाकुंड के निकट है। इस कुंड का अर्ककुंड भी नाम है। पूस माह के रविवार को वहां मेला लगता है । गाजीमियां के ब्याह का उत्सव भी यहां जेठ माह के एक रविवार को बड़े धूमधाम से हिन्दू-मुसलमान मनाते हैं।
केशवादित्य (आदिकेशवघाट)
भगवान सूर्य ने इसी स्थान पर आदिकेशव को अपना गुरु मानकर आराधना शुरू की थी। काशी खंड के अनुसार जो व्यक्ति पादोदक तीर्थ में स्नान करके केशव आदित्य की पूजा करता है, उसे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है।
खखोलादित्य (कामेश्वर गली)
खखोलादित्य का संबंध कद्रू और विनता की कहानी से जुड़ा हुआ है। कद्रू की दासी बनने के बाद विनता ने खखोलख आदित्य के रूप में भगवान सूर्य की आराधना की थी। भगवान सूर्य ने विनता को आशीर्वाद दिया और उसको सभी पापों से मुक्ति मिली थी।
अरुणादित्य (त्रिलोचन महादेव मंदिर)
विनता के पुत्र अरुण ने भगवान आदित्य की मूर्ति-स्थापना और घोर तपस्या से आदित्य को प्रसन्न कर ढेरों वरदान प्राप्त किया। सूर्य ने यह भी वर दिया कि जिस मूर्ति की स्थापना कर अरुण ने तपस्या और उपासना की, वह ''''''''अरुणादित्य'''''''' नाम से काशी में विख्यात रहेगी और उसके दर्शन-पूजन का बड़ा माहात्म्य होगा ।
मयूखादित्य (मंगलागौरी मंदिर)
भगवान सूर्य ने इसी स्थान पर काशी में तपस्या की थी। भगवान शिव और माता पार्वती ने तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान आदित्य को वरदान दिया कि जो भी भक्त रविवार को मयूखादित्य की पूजा करेगा वह कभी बीमार नहीं पड़ेगा।
यमादित्य (संकठा घाट पर यमराज द्वारा स्थापित)
यमघाट पर यमराज ने तपस्या की थी। उन्होंने ही यमेश्वर शिवलिङ्ग और यमादित्य नाम सूर्य की भी मूर्तियां स्थापित की थीं। मंगल को चतुर्दशी तिथि पड़ने पर यमघाट में स्नान और यमेश्वर एवं यमादित्य के दर्शन से अशेष पापों से मुक्ति तथा यमयातना से छुटकारा मिलता है। मंगलवार को भरणी नक्षत्र तथा चतुर्दशी तिथि में यमघाट पर गंगास्नान और दर्शन से पितृ ऋण से भी मुक्ति मिलती है।
गंगादित्य (ललिता घाट)
काशी खंड के अनुसार जब राजा भगीरथ के का अनुसरण करती हुई गंगा वाराणसी पहुंची, तब गंगा की स्तुति करने के लिए भगवान् भास्कर वहीं पहुंचे और आज तक रहकर गंगा स्तुति करते रहते हैं। उनके दर्शनमात्र से दुर्गति और रोग नष्ट हो जाते हैं।
वृद्धादित्य (मीरघाट)
वृद्धहारीत नामक ब्राह्मण ने विशालाक्षी देवी के दक्षिण ओर सूर्य की प्रतिमा स्थापित कर पूजन और तपस्या करने लगा। सूर्य के प्रसन्न होकर वर-याचना करने की बात कहने पर यौवन का वर मांगा। भगवान सूर्य ने तप से प्रसन्न होकर वृद्ध हारीत को सौंदर्यपुंज तारुण्य का वर दे दिया। वृद्धहारीत द्वारा स्थापित मूर्त्ति वृद्धादित्य के नाम से विख्यात हुई।
द्रौपदादित्य
(विश्वनाथ मंदिर में अक्षय वट के पास) तत्कालीन विश्वनाथ मंदिर के दक्षिण की ओर दंडपाणि-मूर्ति के समीप संभवतः वर्तमान हनुमान मंदिर में अक्षयवट के नीचे द्रौपदादित्य की प्रतिमा विद्यमान है।


