मासिक कार्तिगाई पर करें इन मंत्रों का जाप, दूर हो जाएंगे सभी दुख और संकट
हिन्दू पंचांग के अनुसार, 13 जुलाई को मासिक कार्तिगाई है। यह पर्व हर महीने कृतिका नक्षत्र के दिन मनाया जाता है। इस दिन देवों के देव महादेव और उनके अग्रज पुत्र भगवान कार्तिकेय की पूजा-उपासना की जाती है।
साधक मासिक कार्तिगाई दीपम पर भगवान शिव के निमित्त व्रत-उपवास भी रखते हैं। धर्म शास्त्रों में निहित है कि मासिक कार्तिगाई के दिन भगवान शिव ज्योत रूप में प्रकट हुए थे।
इसके लिए मासिक कार्तिगाई के दिन देवों के देव महादेव की ज्योत रूप में पूजा की जाती है।धार्मिक मान्यता है कि शिव की उपासना करने से व्यक्ति के सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं।
साथ ही जीवन में व्याप्त सभी काल, कष्ट, दुख और संकट दूर हो जाते हैं। इस तिथि पर संध्याकाल में पूजा-आरती के पश्चात दीपावली की भांति दीप जलाए जाते हैं। अतः मासिक कार्तिगाई तिथि पर विधि पूर्वक महादेव की पूजा करें। साथ ही पूजा के समय निम्न मंत्रों का जाप अवश्य करें।
भगवान कार्तिकेय के मंत्र
सुब्रहमणयाया नम:।
शत्रु नाशक मंत्र
ॐ शारवाना-भावाया नम:
ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा वल्लीईकल्याणा सुंदरा
देवसेना मन: कांता कार्तिकेया नामोस्तुते।
पूजा मंत्र
'देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव।
कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥'
कार्तिकेय गायत्री मंत्र
'ॐ तत्पुरुषाय विधमहे: महा सैन्या धीमहि तन्नो स्कंदा प्रचोदयात'।
नंदी पूजा मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो नन्दिः प्रचोदयात् ||
ॐ शिववाहनाय विद्महे तुण्डाय धीमहि, तन्नो नन्दी: प्रचोदयात!
रूद्र गायत्री मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय
धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शिव प्रार्थना मंत्र
करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं श्रावण वाणंजं वा मानसंवापराधं ।
विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥
शिव स्तुति मंत्र
ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं,
वन्दे जगत्कारणम् ।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं,
वन्दे पशूनां पतिम् ॥
वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं,
वन्दे मुकुन्दप्रियम् ।
वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं,
वन्दे शिवंशंकरम् ॥
श्री कार्तिकेय स्तोत्र
योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः।
स्कंदः कुमारः सेनानी स्वामी शंकरसंभवः॥
गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः।
तारकारिरुमापुत्रः क्रोधारिश्च षडाननः॥
शब्दब्रह्मसमुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः।
सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः॥
शरजन्मा गणाधीशः पूर्वजो मुक्तिमार्गकृत्।
सर्वागमप्रणेता च वांछितार्थप्रदर्शनः ॥
अष्टाविंशतिनामानि मदीयानीति यः पठेत्।
प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ॥
महामंत्रमयानीति मम नामानुकीर्तनात्।
महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥


