नेपाल त्रासदी: "वो सुबह, जो कभी दोपहर नहीं हुई "
नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर ग्लेशियर फटने से प्रलय, 177 की मौत, 1500 लापता। अनुराग भारतीय की मार्मिक रिपोर्ट।
इंडिया न्यूज़ रिपोर्ट
अनुराग भारतीय की मार्मिक ग्राउंड रिपोर्ट:
नेपाल त्रासदी: वो सुबह, जो कभी दोपहर नहीं हुई नेपाल-तिब्बत बॉर्डर से एक खबर नहीं, एक जनाज़ा आया है।
26 अगस्त। सुबह के 8:30 बजे थे। पहाड़ों पर धूप उतर ही रही थी। रसुवागढ़ी में एक माँ ने शायद अपने बच्चे के लिए थर्मस में चाय भरी होगी। एक तीर्थयात्री ने कैलाश की तरफ देखकर हाथ जोड़े होंगे। किसी पुल पर कोई बच्चा स्कूल जा रहा होगा।
तभी पहाड़ का दिल फट गया।
ल्हेंदे नदी के ऊपर जो ग्लेशियर सदियों से चुपचाप लटका था, वो टूटा नहीं... वो रोया। और उसका रोना इतना भारी था कि उसने नदी का गला घोंट दिया।
और फिर वो झील फट गई।
लोग कहते हैं 160 फीट ऊंची लहर थी। झूठ है। लहरें इतनी ऊंची नहीं होतीं। वो 160 फीट ऊंचा मातम था। पानी, कीचड़, पत्थर, लोहे, लकड़ी और अधूरी ख्वाहिशों की एक दीवार... जो दौड़ी नहीं, निगलती हुई आई।
पहले रसुवागढ़ी इमीग्रेशन सेंटर... जहाँ स्याही सूखने से पहले ही पासपोर्ट बह गए। जहाँ मोहर लगने से पहले ही हाथ बह गए।
अब क्या बचा है?
177 चिताएं, जिनके नाम पता हैं।
1500 घर, जहाँ थाली परोसी गई, पर खाने वाला नहीं आया। उन 1500 में 300 से ज्यादा भारतीय हैं। सोचो... वो 300 लोग जो तीर्थ करने निकले थे, वो खुद तीर्थ हो गए।
भोटेकोशी अब नदी नहीं रही, एक विधवा की तरह बह रही है। त्रिशूली... जिसके नाम में ही त्रिशूल था, आज खुद ही घायल पड़ी है।
19 पुल... जो लोगों को मिलाते थे, वो आज खुद बिछड़ गए।
45 झूला पुल... जो हवा में झूलते थे, वो आज मलबे में दफन हैं।
40 किलोमीटर सड़क... जो किसी की माँ के घर जाती थी, अब कहीं नहीं जाती।
14 बिजली घर... जो कहते थे 'उजाला देंगे', आज खुद अंधेरे में डूबे हैं।
नेपाली सेना के जवान हेलीकॉप्टर से रस्सी फेंक रहे हैं। नीचे कीचड़ है। उस कीचड़ में कोई हाथ ढूंढ रहे हैं। कोई सांस ढूंढ रहा है। ड्रोन उड़ रहे हैं, पर ड्रोन को दर्द नहीं दिखता।
बिहार और यूपी में अलर्ट है। कहा जा रहा है गंडक का जलस्तर बढ़ेगा। पानी तो बढ़ेगा ही, पानी को तो बहना है।
पर जो बह गए... वो कैसे लौटेंगे? पहाड़ आज फिर खामोश है। पर इस बार उसकी खामोशी में एक सिसकी है। एक ऐसी दरार है, जो कभी भरेगी नहीं।
- अनुराग भारतीय--


