काशी का महाश्मशान: धधकती चिताओं के ठंडे होने के पूर्व '94' क्यों लिखा जाता है?
वाराणसी के इस श्मशान में पहले धधकती है लाश... फिर चिता ठंडी होने से पहले मुखाग्नि देने वाला भस्म पर क्यों लिखता है 94? -स्पेशल रिपोर्ट
INDIA NEWS REPORT
INR: SPECIAL REPORT
VARANASI: धरती की सबसे प्राचीन नगरी काशी के विषय में अनेकों मान्यताये है जो वेदों से लेकर गर्न्थो तक वर्णित है उनमें से एक मान्यता जुड़ी है महाश्मशान मणिकर्णिका घाट से यहाँ धधकती चिताओं के पूर्ण रूप से ठंडे होने से पूर्व मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति राखो के बीच उंगली या काष्ट (लकड़ी) से 94 या 94/राम क्यों लिखता है आज जानेंगे इस रहस्य को।
काशी महाश्मशान, मणिकर्णिका घाट का ही दूसरा नाम है। इसे "महाश्मशान" कहा जाता है क्योंकि यहाँ चौबीसों घंटे चिताएँ जलती रहती हैं और कभी बुझती नहीं हैं। यह घाट वाराणसी में गंगा नदी के तट पर स्थित है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ अंतिम संस्कार होने पर व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है, जिससे वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
स्कन्द पुराण और काशी खंड जैसे ग्रंथों के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर स्वयं भगवान विष्णु ने तप किया था और अपने चक्र से मणिकर्णिका कुंड खोदा।
इस दौरान उनका मणि और पार्वती का कुंडल इस स्थान पर गिरा था, जिसकी वजह से इस घाट का नाम मणिकर्णिका घाट पड़ गया। मणिकर्णिका के महाश्मशान में मौत को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि दाह संस्कार करने वाले व्यक्ति को अपने उंगली या काष्ठ से चिता की आग ठंडा करने से पहले 94 लिखना होता है।
आपको बता दें कि 94 को मुक्ति मंत्र कहा जाता है। मान्यता है कि इसे खुद भगवान शंकर ग्रहण करते हैं।बनारस में 94 गुण शव को समर्पित करके उसके लिए मोक्ष की मांग करने की प्रथा है। बाकी ब्रह्मा से मिलने वाले 6 गुण यानी जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ और हानि इंसान के हाथ में नहीं होते।
अर्थात हे ईश्वर! आपकी दी हुई 94 गुण मनुष्य को दिया गया और 6 गुण जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ और हानि जो कि आपके हाथ मे सदा से है हम आपको समर्पित करते है।
यहाँ एक अनोखी परंपरा भी है जहाँ चैत्र शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नगरवधुएं अपनी नृत्यांजलि अर्पित करती हैं और यह माना जाता है कि इससे उन्हें अगले जन्म में नरक से मुक्ति मिलती है।


