UGC विनियम को समावेशी बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान अधिवक्ता कौस्तुभ त्रिपाठी ने लिखा प्रधानमंत्री को पत्र

अगर ऐसा संशोधन होता है तो विपक्षी दल भी इसका खुलकर विरोध नहीं कर पाएंगे क्योंकि इस संशोधन में सारी जातियां, धर्म और वर्ग आ जाएंगे।कौस्तुभ त्रिपाठी विद्धवान वकील इलाहाबाद हाईकोर्ट

UGC विनियम को समावेशी बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान अधिवक्ता कौस्तुभ त्रिपाठी ने लिखा प्रधानमंत्री को पत्र
एडवोकेट कौस्तुभ त्रिपाठी इलाहाबाद हाईकोर्ट
UGC विनियम को समावेशी बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान अधिवक्ता कौस्तुभ त्रिपाठी ने लिखा प्रधानमंत्री को पत्र

INDIA NEWS REPORT इलाहाबाद समाचार साभार कौस्तुभ त्रिपाठी एडवोकेट UGC विनियम को समावेशी बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान अधिवक्ता कौस्तुभ त्रिपाठी ने लिखा प्रधानमंत्री को पत्र। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को "उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026" (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) अधिसूचित किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव को पूरी तरह खत्म करना, समान अवसर सुनिश्चित करना और एक समावेशी (inclusive) शैक्षणिक माहौल बनाना है। परंतु उक्त विनियमन की धारा 3 (1) ग. इसके उद्देश्यों के खिलाफ है और जातिगत विभेदों को बढ़ाती है ऐसा सवर्ण जातियों का आरोप है जिसमें संशोधन करने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता कौस्तुभ त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है जो इस प्रकार है। सेवा में, माननीय प्रधानमंत्री महोदय भारत सरकार विषय – उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026 में संशोधन हेतु माननीय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को "उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026" (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) अधिसूचित किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव को पूरी तरह खत्म करना, समान अवसर सुनिश्चित करना और एक समावेशी (inclusive) शैक्षणिक माहौल बनाना है। परंतु उक्त विनियमन की धारा 3 (1) ग. इसके उद्देश्यों के खिलाफ है और जातिगत विभेदों को बढ़ाती है। धारा 3 (1) ग. "जाति-आधारित भेदभाव" का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है” इस प्रकार धारा 3 (1) ग. जाति आधारित भेदभावों को सिर्फ कुछ वर्गों तक सीमित कर खुद जाति आधारित विभेदों को बढ़ाने का काम करती है। माननीय ये सर्वविदित है कि जाति आधारित भेदभाव केवल कुछ वर्गों या जातियों तक सीमित नहीं है देश के कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सवर्ण भी भेदभाव और दुर्व्यवहार के शिकार होते हैं। अकसर विश्वविद्यालयों में आर्यों भारत छोड़ो, आर्य विदेशी हैं, ब्राहमण भारत छोड़ो, ब्राहमणों की कब्र खुदेगी..... आदि आपत्तिजनक जनक नारे लगाए और लिखे जाते हैं। सनातन धर्म का पालन करने वाले लोगों पर अंधभक्त, पोंगा पंडित, धूर्त, पाखंडी, आदि टिप्पडी की जाती हैं। इसी का परिणाम है कि हिन्दू शिखा रखने, तिलक लगाने और अपनी धार्मिक आस्थाओं का पालन करने से भी कतराने लगा है। इसी प्रकार मुसलमानों और ईसाइयों में भी आपस में जाति के आधार पर भेदभाव होता है, जिसको वर्तमान विनियमन द्वारा खत्म करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। महोदय जाति-आधारित भेदभाव को किसी वर्ग या जाति का बहिष्कार करके खत्म नहीं किया जा सकता अपितु सभी का समावेशन ही जाति आधारित भेदभाव को पूरी तरह खत्म कर सकता है। अतः आपसे निवेदन है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विनियम, 2026 की धारा 3 (1) ग. में संशोधन करते हुए "जाति-आधारित भेदभाव" का अर्थ किसी भी जाति, जनजाति, वर्ग, समुदाय या परंपरा के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति, जनजाति, वर्ग, समुदाय, परंपरा के आधार पर भेदभाव है;” करने की कृपा करें | कौस्तुभ त्रिपाठी अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय मो. 9454516100 ।