विभाजन की विभीषिका की जाँच के लिए राष्ट्रीय आयोग गठित हो: वाराणसी के अधिवक्ताओं ने राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन

वाराणसी के अधिवक्ताओं ने राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन, 1947 के विभाजन की परिस्थितियों, निर्णय-प्रक्रिया और मानवीय त्रासदी की स्वतंत्र जाँच की मांग

विभाजन की विभीषिका की जाँच के लिए राष्ट्रीय आयोग गठित हो: वाराणसी के अधिवक्ताओं ने राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन

INDIA NEWS REPORT

 कुलदीप बरनवाल

वाराणसी।वर्ष 1947 के भारत-विभाजन की परिस्थितियों, कारणों और उस दौरान हुई मानवीय त्रासदी की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जाँच की मांग को लेकर गुरुवार को अधिवक्ताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी वाराणसी श्री सत्येंद्र कुमार से मुलाकात की और माननीय राष्ट्रपति महोदया के नाम संबोधित ज्ञापन सौंपा।

प्रतिनिधिमंडल ने केंद्र सरकार से “राष्ट्रीय विभाजन त्रासदी एवं परिस्थितियाँ जाँच आयोग” के गठन की मांग की है।

क्या है मांग?

प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि इस जाँच का उद्देश्य किसी धर्म, जाति, समुदाय या राजनीतिक दल को दोषी ठहराना नहीं है। बल्कि 1947 की घटनाओं के पीछे की वास्तविक परिस्थितियों, निर्णय-प्रक्रिया, सीमा निर्धारण और विभाजन के दौरान हुई हिंसा-विस्थापन को ऐतिहासिक अभिलेखों, सरकारी दस्तावेजों और प्रत्यक्षदर्शी गवाहियों के आधार पर समझकर राष्ट्रीय अभिलेख के रूप में सुरक्षित करना है।

किन बिंदुओं पर होगी जाँच - अधिवक्ताओं ने ये रखीं 4 प्रमुख मांगें-

1. निर्णय-प्रक्रिया और सीमा निर्धारण की जाँच- वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश त्रिवेदी ने कहा कि विभाजन किन परिस्थितियों में हुआ, सत्ता हस्तांतरण की समय-सारिणी क्या थी और Punjab Boundary Commission, Bengal Boundary Commission व Radcliffe Award से जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन जरूरी है।

2. *हिंसा, विस्थापन और पीड़ितों का रिकॉर्ड संरक्षित हो- वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष शुक्ला ने मांग की कि विभाजन के दौरान हुई हत्याओं, आगजनी, लूट, जबरन विस्थापन, महिलाओं-बच्चों के विरुद्ध अपराध और शरणार्थी शिविरों से संबंधित सरकारी दस्तावेजों का राष्ट्रीय स्तर पर संकलन किया जाए।

3. राष्ट्रीय विभाजन डिजिटल अभिलेखागार बने- भारत, ब्रिटेन, पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित अन्य देशों में उपलब्ध विभाजन संबंधी फाइलें, पुलिस-सैन्य रिकॉर्ड, समाचार-पत्र, पत्र, डायरी और मानचित्रों के डिजिटलीकरण की मांग की गई।

4. राष्ट्रीय विभाजन मौखिक इतिहास परियोजना- विभाजन पीड़ितों एवं उनके परिवारों की गवाही सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष परियोजना शुरू करने की मांग की गई, ताकि प्रत्यक्षदर्शियों की स्मृतियाँ आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकें।

“सत्य किसी समुदाय का शत्रु नहीं”

संयोजक शशांक शेखर त्रिपाठी, अधिवक्ता ने कहा कि "वर्ष 1947 का विभाजन केवल भौगोलिक सीमाओं का परिवर्तन नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी थी।"

उन्होंने कहा, “सत्य किसी समुदाय का शत्रु नहीं होता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शक होता है।” इसलिए इस जाँच का उद्देश्य दोषारोपण नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों का दस्तावेजीकरण और पीड़ितों की स्मृति का सम्मान है।

जितेंद्र तिवारी, संरक्षक राजस्व बार ने 1946 से 1950 तक के घटनाक्रम, कानून-व्यवस्था और जन-विस्थापन से निपटने की प्रशासनिक तैयारियों की समीक्षा पर जोर दिया।

जिलाधिकारी श्री सत्येंद्र कुमार से अनुरोध किया गया कि इस ज्ञापन को केंद्र सरकार तक आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रेषित किया जाए।

प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहे

शशांक शेखर त्रिपाठी - संयोजक, भाजपा विधि प्रकोष्ठ काशी क्षेत्र एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष, दी बनारस बार एसोसिएशन, राजेश त्रिवेदी, आशुतोष शुक्ला, जितेंद्र तिवारी, उपेंद्र निगम, आशुतोष सक्सैना, गुलशन मिश्रा, गौरव मिश्रा, मोनी श्रीवास्तव, सुजीत कुमार सिंह, पल्लवी श्रीवास्तव, राही पटेल, श्वेता अग्रहरि सहित अन्य अधिवक्ता।