वाराणसी: छत गिरने के बाद फिर जर्जर भवन में शिफ्ट हुआ कबीरचौरा आयुर्वेदिक अस्पताल, मरीजों की सुरक्षा पर सवाल!
वाराणसी के कबीरचौरा स्थित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय को जुलाई 2024 में छत गिरने के बाद बंद कर दिया गया था। जून 2026 में प्रशासन ने इसे फिर उसी जर्जर भवन में शिफ्ट कर दिया, जहां दीवारों में दरारें और मलबा मौजूद है। पास ही 315 करोड़ से 500 बेड का सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बन रहा है, लेकिन मरीजों को अभी भी असुरक्षित इमारत में इलाज कराना पड़ रहा है।
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वाराणसी: कबीरचौरा स्थित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय की जर्जर हालत एक बार फिर चर्चा में है। जुलाई 2024 में छत का हिस्सा गिरने से एक महिला और उसके बच्चे के घायल होने के बाद बंद किया गया यह अस्पताल, जून 2026 में प्रशासन द्वारा उसी असुरक्षित इमारत में दोबारा शुरू कर दिया गया है।
जर्जर भवन में दोबारा शिफ्टिंग, सुरक्षा पर उठे सवाल
जुलाई 2024 में अस्पताल की छत की पटिया गिरने से इलाज कराने आई एक महिला और उनका मासूम बच्चा गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हादसे के बाद अस्पताल को वहां से हटाकर सुरक्षित स्थान पर संचालित किया जा रहा था।
लेकिन जून 2026 में प्रशासन ने अस्पताल को फिर उसी भवन में शिफ्ट कर मरीजों के लिए खोल दिया। आज भी इमारत की खिड़कियों और दीवारों पर बड़ी-बड़ी दरारें और पुराना मलबा साफ देखा जा सकता है। स्थानीय लोगों और मरीजों का कहना है कि इससे डॉक्टरों और मरीजों की जान लगातार खतरे में है।
चिकित्सालय के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. नीलाद्रि भट्टाचार्या ने बताया कि विभाग ने केवल उस सीमित हिस्से की मरम्मत कराई है जहां वर्तमान में ओपीडी और इलाज संचालित किया जा रहा है। उनका दावा है कि वर्तमान ओपीडी एरिया में कोई खतरा नहीं है, जबकि भवन का बाकी हिस्सा अब भी खस्ताहाल है।
पास ही बन रहा है 315 करोड़ का सुपर स्पेशलिटी अस्पताल
कबीरचौरा परिसर में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बड़े बदलाव हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने कबीरचौरा के पुराने अनुपयोगी सरकारी ढांचों को ध्वस्त कर ₹315.48 करोड़ की लागत से 500 बेड का 8 मंजिला आधुनिक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाने की मंजूरी दी है।
इस निर्माण कार्य के चलते आसपास के कई पुराने विभागों और चिकित्सालयों की शिफ्टिंग की जा रही है।
बड़ा सवाल: विकास के नाम पर जान से खिलवाड़?
जब सरकार खुद 315 करोड़ खर्च कर 500 बेड का नया सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बना रही है, तो सवाल ये उठता है कि मरीजों और डॉक्टरों को जान जोखिम में डालकर जर्जर भवन में दोबारा क्यों शिफ्ट किया गया?
क्या यह प्रशासन की लापरवाही है, या बजट और समय बचाने की मजबूरी? और अगर कल फिर कोई हादसा हुआ, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
स्थानीय लोगों की मांग साफ है - जब तक नया भवन तैयार नहीं हो जाता, आयुर्वेदिक अस्पताल को किसी सुरक्षित वैकल्पिक स्थान पर संचालित किया जाए।
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वाराणसी | राजकीय आयुर्वेद अस्पताल खुद बीमार ! खंडहर बना चिकित्सालय | जिम्मेदार कौन?
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