पोलियो ने बच्चों को लोहे के ताबूत में बंद कर दिया था, वैज्ञानिक ने 50 हजार करोड़ ठुकराकर कहा- क्या सूरज को पेटेंट कर सकते हो?

पोलियो का इतिहास, Iron Lung, डॉ. जोनास साल्क का बलिदान और भारत का Pulse Polio अभियान। जानिए कैसे एक वैज्ञानिक ने 7 बिलियन डॉलर का पेटेंट फ्री में देकर करोड़ों बच्चों की जान बचाई।

पोलियो ने बच्चों को लोहे के ताबूत में बंद कर दिया था, वैज्ञानिक ने 50 हजार करोड़ ठुकराकर कहा- क्या सूरज को पेटेंट कर सकते हो?
इंसानियत का मसीहा: Iron Lung से 2 बूंद तक का सफर, कैसे Jonas Salk ने 50 हजार करोड़ ठुकराकर कहा - "क्या सूरज को पेटेंट कर सकते हो?"

India News Report / Special Desk

पोलियो हिस्ट्री - वो बीमारी जिसने बच्चों को लोहे के ताबूत में बंद कर दिया था, और वो वैज्ञानिक जिसने 50 हजार करोड़ ठुकरा दिए

"क्या आप सूरज को पेटेंट कर सकते हैं?" - ये एक लाइन ने करोड़ों बच्चों की जिंदगी बचा ली।

जब गर्मी का मतलब मौत था - A World in Fear

आज हम गर्मी में बच्चों को पार्क भेजते हैं। 1950 के दशक में अमेरिका और यूरोप में गर्मी का मतलब था - दहशत। हर गर्मी में एक अदृश्य दानव आता था - पोलियोवायरस। ये गंदे पानी और मल से फैलता था। माता-पिता अखबार में पढ़ते थे - POOLS CLOSED, STAY INDOORS, NO PLAYGROUNDS।

ये वायरस शरीर में जाकर सीधा नर्वस सिस्टम पर हमला करता था। मोटर न्यूरॉन, जो दिमाग से मसल्स तक सिग्नल भेजते हैं, वो कट जाते थे। नतीजा 200 में से 1 बच्चे को परमानेंट पैरालिसिस। सबसे भयानक - अगर डायाफ्राम और छाती की मांसपेशियां पैरालाइज हो गईं, तो बच्चा खुद से सांस नहीं ले पाता था।

इसे जिंदा रखने के लिए एक मशीन बनाई गई - Iron Lung। लोग इसे Iron Coffin (लोहे का ताबूत) भी कहते थे। 300 किलो का स्टील सिलेंडर, जिसमें बच्चे को गर्दन तक बंद कर दिया जाता था। अंदर वैक्यूम बनता था, छाती फूलती थी, सांस आती थी। कैलिफोर्निया के Rancho Los Amigos Hospital की तस्वीरें आज भी रोंगटे खड़ी कर देती हैं - एक हॉल में 30-30 Iron Lung लाइन से लगे हैं।

1955 - चमत्कार और वो आदमी जिसने अरबों को लात मार दी

फिर आया 1955। डॉ. जोनास साल्क ने सालों की जुनूनी रिसर्च के बाद मरे हुए पोलियो वायरस से पहला टीका (IPV) बनाया। इतिहास का सबसे बड़ा ट्रायल - 18 लाख बच्चों पर। और 12 अप्रैल 1955 को ऐलान हुआ - "The Vaccine Works!"

उसी रात लाइव टेलीविजन पर पत्रकार ने पूछा - "Doctor, who owns the patent?" सबको लगा, अब ये आदमी दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनने वाला है। उस पेटेंट की कीमत आज लगभग 7 बिलियन डॉलर यानी 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा होती।

साल्क ने कहा, इतिहास की सबसे बड़ी लाइन: "There is no patent. Could you patent the sun?" उन्होंने वैक्सीन को दुनिया को फ्री में दे दिया। उस दिन विज्ञान ने पैसा नहीं, इंसानियत चुनी।

सुई से काम नहीं चलेगा - दूसरा मास्टर स्ट्रोक

साल्क का टीका इंजेक्शन था। भारत जैसे देशों में करोड़ों बच्चों को सुई लगाना प्रैक्टिकल नहीं था। यहां आए दूसरे हीरो - अल्बर्ट सेबिन, 1961। उन्होंने वायरस को लैब में इतना कमजोर कर दिया कि वो बीमारी पैदा ही नहीं कर सकता, पर इम्युनिटी दे देता है। और सबसे बड़ा धमाका - NO NEEDLE. 2 DROPS BY MOUTH. मीठी, गुलाबी दवा। OPV - Oral Polio Vaccine। यही वो "दो बूंद जिंदगी की" है।

दुनिया का सबसे बड़ा युद्धक्षेत्र बना - भारत

90 के दशक तक दुनिया के 60% पोलियो केस अकेले भारत में थे। हर दिन 500 से ज्यादा बच्चे अपंग हो रहे थे। 1988 में पूरी दुनिया में 350,000 केस थे।

1995 में भारत सरकार ने इतिहास का सबसे बड़ा पब्लिक हेल्थ ऑपरेशन लॉन्च किया - Pulse Polio Campaign। ये वैक्सीनेशन नहीं, मिलिट्री ऑपरेशन था।

नारा बना - अमिताभ बच्चन ने TV पर पूरे देश को डांटा - "दो बूंद जिंदगी की"। रणनीति - No Child Missed - रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, गांव के मेले और बर्फ से ढके कश्मीर के पहाड़ों तक। एक-एक नेशनल राउंड में 23 लाख वैक्सीनेटर और एक ही दिन में 17 करोड़ बच्चों को दवा।

रिजल्ट - 1988 में 3,50,000 केस से घटकर आज सिर्फ 50-60 केस रह गए हैं, वो भी सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान में। भारत को 27 मार्च 2014 को WHO ने पोलियो मुक्त घोषित किया। आखिरी केस 13 जनवरी 2011 को हावड़ा में आया था।

सोचो, अगर साल्क उस दिन पेटेंट ले लेता, तो एक-एक बूंद की कीमत लगती। गरीब देश खरीद ही नहीं पाते। इसलिए कहा जाता है - दवाइयां अरबपति बनाती हैं, पर पोलियो की दवा ने इंसानियत को जिंदा रखा।