क्या सोयाबीन पहले सुअरों के लिए होता था? जानिए कैसे सूअरों का चारा बना इंसानों का सुपरफूड
क्या आप जानते हैं सोयाबीन को कभी सूअरों का चारा कहा जाता था? जानिए कैसे Hog Feed से निकलकर यह दुनिया का सबसे पौष्टिक सुपरफूड बना, इसका रोचक इतिहास।
इतिहास । डेस्क । आज जिम जाने वाला हर लड़का सोयाबीन को सुपरफूड कहता है। प्रोटीन का खजाना, शाकाहारियों का अंडा। लेकिन क्या आप जानते हैं, आज से 100 साल पहले तक पश्चिमी देशों में इसे इंसानों का खाना माना ही नहीं जाता था?
उस समय सोयाबीन को ‘Hog Feed’ यानी सुअरों का चारा कहा जाता था।
चीन में 5000 साल से इंसानों का खाना, अमेरिका में जानवरों का
सोयाबीन की उत्पत्ति चीन में करीब 5000 साल पहले हुई थी। वहां इसे पवित्र अनाज माना जाता था। लेकिन जब यह 18वीं-19वीं सदी में अमेरिका और यूरोप पहुंचा, तो लोगों को इसका स्वाद पसंद नहीं आया।
अमेरिकी किसानों ने देखा कि इसकी फली और पत्तियां जानवर बड़े चाव से खाते हैं। खासकर सूअर सोयाबीन खाकर बहुत जल्दी मोटे हो जाते थे। इसलिए उन्होंने इसे बड़े पैमाने पर सूअरों और मुर्गियों को खिलाने के लिए उगाना शुरू कर दिया।
हेनरी फोर्ड ने बदली किस्मत
सोयाबीन की किस्मत बदली 1930 के दशक में, जब अमेरिका के प्रसिद्ध उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने इसमें दिलचस्पी ली। फोर्ड अपनी कारों के लिए सस्ता प्लास्टिक और पेंट बनाना चाहते थे। उन्हें सोयाबीन के तेल में इसका हल मिला।
तेल निकालने के बाद जो खली (Soybean Meal) बचती थी, वह प्रोटीन से भरपूर थी। यह खली फिर से सुअरों को खिलाई जाती थी। उस दौर की कृषि पत्रिकाओं में साफ लिखा मिलता है - “Soybean is best crop for fattening hogs”
तो इंसानों ने खाना कब शुरू किया?
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब अमेरिका में मांस और तेल की भारी कमी हो गई, तब सरकार ने लोगों से अपील की कि सोयाबीन खाओ। वैज्ञानिकों ने इससे सोया दूध, सोया तेल और टोफू बनाना शुरू किया।
युद्ध के बाद इसकी पौष्टिकता पर रिसर्च हुई और पता चला कि इसमें 40% तक प्रोटीन होता है, जो किसी भी दाल से ज्यादा है। बस, फिर क्या था। सुअरों का चारा देखते ही देखते इंसानों का सुपरफूड बन गया।
निष्कर्ष
तो हां, यह कहना गलत नहीं होगा कि सोयाबीन कभी सुअरों के लिए ही उगाया जाता था। लेकिन आज वही सोयाबीन दुनिया की सबसे बड़ी प्रोटीन क्रॉप है। किस्मत सच में कभी भी बदल सकती है, सोयाबीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


