हजारों खबरें लिखने वाला खामोश हो गया... आखिरी खबर उसकी अपनी थी, लिखने वाला कोई अपना नहीं था!

जिस कलम ने हजारों की कहानी लिखी, आज उसकी आखिरी कहानी लिखने कोई अपना नहीं था। वाराणसी में सेवानिवृत्त पत्रकार की दर्दनाक मौत, इंसानियत ने दिया कंधा।

हजारों खबरें लिखने वाला खामोश हो गया... आखिरी खबर उसकी अपनी थी, लिखने वाला कोई अपना नहीं था!

INDIA NEWS REPORT 

 वाराणसी डेस्क

वाराणसी। जिस कलम ने हजारों लोगों की कहानी लिखी, आज उसी कलम वाले की आखिरी कहानी लिखने के लिए कोई अपना नहीं था। ये कैसी विडंबना है?

ये कहानी है विजय शंकर यादव जी की। जो कभी "राजनीतिक संवाददाता" के नाम से जाने जाते थे।

आज सुबह शीरगोवर्धन से अमन यादव जी का फोन आया - "भैया, एक व्यक्ति का निधन हो गया है, परिवार का कोई नहीं है..."

जब हम मौके पर पहुंचे, तो एक कमरे में एक गुमनाम लाश पड़ी थी। पास में दो चीजें थीं - एक आधार कार्ड और एक धुंधला सा पत्रकार पहचान-पत्र। पहचान-पत्र पर अब भी लिखा था - राजनीतिक संवाददाता।

आधार पर पता था - C-27/65, जगतगंज, संस्कृत विश्वविद्यालय। पता किया तो पता चला वो मकान कब का बिक चुका है।

हमने परिवार को ढूंढने की बहुत कोशिश की। पत्नी से बात हुई, बोलीं - तलाक हो चुका है। रिश्तेदारों को फोन लगाया, किसी ने फोन नहीं उठाया, किसी ने आने से मना कर दिया।

जरा सोचिए... जिस आदमी ने अपनी जिंदगी भर दूसरों की आवाज बनकर खबरें लिखी होंगी, नेता, मंत्री, अफ़सरों के किस्से लिखे होंगे... आज उसी की मौत की खबर लिखने वाला कोई नहीं था। उसकी आखिरी खबर में उसका कोई अपना किरदार ही नहीं था।

पुलिस को सूचना दी गई। फिर भी कोई नहीं आया।

आखिर में काशी ने अपना फर्ज निभाया। खून के रिश्ते तो नहीं आए, पर इंसानियत के रिश्ते आ गए।

अमन कबीर सेवा न्यास ने उन्हें अपना माना। बेटा बनकर, भाई बनकर हरिश्चंद्र घाट ले गए। हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया, मुखाग्नि दी।

उस वक्त मन में एक ही बात थी - "जब अपने नहीं आए, तो हम ही उनके अपने सही।"

विजय जी आज चले गए, मणिकर्णिका की राख में विलीन हो गए। उनके साथ कोई अपना नहीं था, फिर भी वो अकेले नहीं थे। कुछ अनजान लोग खड़े थे, जो उन्हें अपना समझ कर विदा कर रहे थे।

काशी ने फिर साबित कर दिया - रिश्ता खून से नहीं, इंसानियत से बनता है।

उन सभी का दिल से धन्यवाद, जिन्होंने एक गुमनाम पत्रकार को गुमनामी की मौत नहीं मरने दी।

पत्रकार विजय शंकर यादव जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि और अमन कबीर सेवा न्यास को हृदय से आभार, जिन्होंने इंसानियत का फर्ज निभाया।

उम्र भर लिखता रहा वो गैरों की कहानियाँ, आखिरी सफर में उसकी खुद की खबर बन गई। जिनके लिए कलम घिस दी रात-रात भर, आज उनके बीच ही वो बेखबर बन गई।

एक आह भरी होगी, हमने न सुनी होगी... जाते-जाते तुमने आवाज तो दी होगी।

कलम तो खामोश हुई, स्याही सूख गई, पर एक सवाल छोड़ गई काशी के घाट पर... क्या खबरें लिखने वालों की आखिरी खबर यूँ ही गुमनाम रह जाएगी?